साधना का जन्म 2 सितम्बर 1941 को करांची,सिंध(अब पाकिस्तान) में हुआ था दंगों के बीच 1947 में कराची से भाग कर शिवदासानी परिवार बंबई आ गया और वही बस गया. साधना बचपन से अभिनेत्री बनना चाहती थी अपने पिता की मदद करने के लिए वो फिल्मों में आई, क्यों की उनके परिवार का सब कुछ करांची में छुट गया था साधना एकलौती औलाद थी साधना यह नाम दिया था उनके पिता ने उस दौर में साधना बोस बतौर अभिनेत्री लोगों के दिलो दिमाग पर छाई थी,साल था 1955 "राज कपूर" की फिल्म श्री 420 के गीत " ईचक दाना बीचक दाना" में एक कोरस लड़की की भूमिका मिली थी साधना को उस वक्त वो 15 साल की थी,दरअसल साधना को वह कुछ ADVT.कपनी ने मौक़ा दिया था अपने उत्पादकों के लिए उन्हें भारत की पहली सिंधी फिल्म अबना, (1958) में काम करने का मौक़ा मिला जिसमें उन्होंने अभिनेत्री शीला रमानी की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी और इस फिल्म के लिए उन्हें 1 रुपए की टोकन राशि का भुगतान किया गया था. इस सिंधी ब्यूटी को सशधर मुखर्जी, ने देखा.जो उस वक्त बहुत बड़े फिल्मकार थे, सशधर मुखर्जी को अपने बेटे जॉय मुखर्जी, के लिए जो उनके साथ हेरोइन का किरदार करे एक नये चेहरे की तलाश थी साल था 1960 " लव इन शिमला" रिलीज़ हुई, इस फिल्म के डाइरेक्टर थे आर.के. नैयर, और उन्होंने ही साधना को नया लुक दिया "साधना कट" दरअसल साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे कवर किया गया बालों से उस स्टाईल का नाम ही पड़ गया "साधना कट" And from this movie onwrds Sadhna has become most stylish with the special hair cut called "साधना कट" फिल्मालय से उनका तीन साल का अनुबंध था,इसी कड़ी में थी एक मुसाफिर एक हसीना एक और मुज़िकल हिट.जिसके डाइरेक्टर थे राज खोसला. बिमल रॉय ने उन्हें परख में मौक़ा दिया परख को कई अवार्ड भी मिले थे फिल्म में साधना ने साधारण गांव लड़की का किरदार निभाया था.. 1961 में एक और "हिट" फिल्म हम दोनों में देव आनंद के साथ थी इस B/W फिल्म को colourized किया गया था और 2011 में फिर से रिलीज़ किया गया था 1962 में वह फिर से निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा असली - नकली में देव आनंद के साथ थी. 1963 में, टेक्नीकलर फिल्म मेरे मेहबूब एच एस रवैल द्वारा निर्देशित उनके फ़िल्मी कैरियर ब्लॉकबस्टर फिल्म थी यह फिल्म 1963 की भी ब्लॉकबस्टर फिल्म थी और 1960 के दशक के शीर्ष 5 फिल्मों में स्थान पर रहीं.मेरे मेहबूब में निम्मी पहले साधना वाला रोल करने जा रही थी न जाने क्या सोच कर निम्मी ने साधना वाला रोल ठुकरा निम्मी ने राजेंद्र कुमार की बहन का रोल किया.साधना के बुर्के वाला सीन इंडियन क्लासिक में दर्ज है. साल 1964 में उनके डबल रोल की फिल्म रिलीज़ हुई मनोज कुमार हीरो थे "वो कौन थी" सफेद साड़ी पहने महिला भूतनी का यह किरदार हिन्दुस्तानी सिनेमा में अमर हो गया इस फिल्म से हिन्दुस्तानी सिनेमा को नया विलेन भी मिला जिसका नाम था प्रेम चोपड़ा साधना को लाज़वाब एक्टिंग के लिए प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में पहला फिल्मफेयर नामांकन भी मिला था, क्लासिक्स फिल्म वो कौन थी , मदन मोहन के लाज़वाब संगीत और लता मंगेशकर की लाज़वाब गायकी के लिए भी याद की जाती है "नैना बरसे रिमझिम " का आज भी कोई जवाब नहीं है इस फिल्म के लिए साधना को मोना लिसा की तरह मुस्कान के साथ" शो डाट कहा गया था यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर "हिट" थी.साल 1964 में साधना का नाम एक हिट से जुड़ा यह फिल्म थी राजकुमार,हीरो थे शम्मी कपूर राज कुमार भी साल 1964 की ,ब्लॉकबस्टर फिल्म थी. साल 1965 की मल्टी स्टार कास्ट की फिल्म वक्त रिलीज़ हुई ब्लॉकबस्टर थी इस साल की राज कुमार सुनीलदत्त, शशीकपूर, बलराज साहनी,अचला सचदेव और शर्मिला टैगोर वक्त में थे,वक्त में साधना ने तंग चूड़ीदार- कुर्ता पहना जो इस पहले किसी भी हेरोइन ने नहीं पहना था. साल 1965 साधना के लिए एक और कामयाबी लाया था इसी साल रिलीज़ हुई रामनन्द सागर की "आरजू"शंकर जयकिशन का लाजवाब संगीत हसरत जयपुरी का लिखा यह गीत जो गाया था लता जी ने "अजी रूठ कर अब कहाँ जायेगा" "आरजू के खाते में कई अवार्ड आये,1965 की एक और ब्लॉकबस्टर फिल्म जिसने कई और रिकार्ड भी कायम किये थे. फिल्म "आरजू" में भी साधना ने अपनी स्टाईल को बरकरार रखा. साधना ने रहस्यमयी फ़िल्में मेरा साया (1966)सुनील दत्त और अनीता मनोज कुमार (1967) दोनों की फिल्मों की हेरोइन साधना डबल रोल में थी, संगीतकार एक बार मदन मोहन ही थे,फिल्म मेरा साया का थीम सोंग " तू जहा जहा चलेगा, मेरा साया साथ होगा" "नैनो में बदरा छाए" जैसे गीत आज भी दिल को छुते है.अनीता (1967) से सरोज खान को मौक़ा मिला था,सरोज खान उन दिनों के मशहूर डांस मास्टर सोहन लाल की सहायक थी गाना था झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में इस गाने को आवाज़ दी दी थी आशा भोसले ने उस दौर में जब यह यह गाना स्क्रीन पर आता था तो दर्शक दीवाने हो जाते थे,और परदे पर सिक्कों की बौछार शुरू हो जाती थी जिन्हें लुटने के लिए लोग आपस में लड़ जाते थे. इस फिल्म के गीत भी राजा मेंहदी अली खान ने लिखे थे.कहते हैं की साधना को नजर लग गयी थी उन्हें थायरॉयड हो गया था अपने ऊँचे फ़िल्मी कैरियर के बीच वो इलाज़ के लिए अमेरिका के बोस्टन चली गयी अमेरिका से लौटने के बाद, वो फिर फ़िल्मी दुनिया में लौटी और कई कामयाब फ़िल्में उन्होंने की इंतकाम (1969) में अभिनय किया, एक फूल माली इन दोनों फिल्मों के हीरो थे संजय (1969), बीमारी ने साधना का साथ नहीं छोड़ा अपनी बीमारी को छिपाने के लिए उन्होंने अपने गले में पट्टी बंधी अक्सर गले में दुपट्टा बांध लेती थी,यही साधना आइकन बन गया था और उस दौर की लड़कियों ने इसे भी फैशन के रूप में लिया था,साल 1974 गीता मेरा नाम रिलीज़ हुई जो उनकी आखिरी कमर्शियल हिट थी,इस फिल्म की डाइरेक्टर वो थी इस फिल्म में भी उनका डबल रोल था सुनील दत्त और फ़िरोज़ खान हीरो थे. साधना
की कई फ़िल्में बहुत देर से रिलीज़ हुई 1970 के आस पास अमानत को रिलीज़ होना था वो 1975 में रिलीज़ हुई तब बहुत कुछ बदल चुका था 1978 में महफ़िल और 1994 में उल्फत की नयी मंजिलें.साधना ने 6 मार्च 1966 को निर्देशक आर.के. नैयर, के साथ शादी कर ली जो 1995 में हमेशा के उनका साथ छोड़ गये इस शादी से साधना के पिता खुश नहीं थे, आर.के. नैयर दमे के मरीज़ थे दमा दम के साथ जता है और आर.के. नैयर के साथ भी यही हुआ साधना के कोई आस औलाद नहीं हुई.कहा जाता है की राज खोसला और आर.के. नैयर साधना की ज़िन्दगी यही दो नाम थे दोनों ही साधना के दीवाने थे राज खोसला और आर.के. नैयर ने साधना के साथ जितनी भी फ़िल्में की उस में पूरी जान इन दोनों ने लगा दी थी,राज खोसला और आर.के. नैयर ने अलग अलग वक्त में साधना के फ़िल्मी सफर को नये मुकाम तक पहुंचाया था. आज कल वो तनहा हैं उनकी तन्हाई को कम करने के लिए उनकी दोस्त नंदा हेलन वहीदा रहमान उनसे मिलने जाती है,साल 2010 में साधना एक बार फिर ख़बरों में आई बिल्डर यूसुफ लकड़ावाला ने उनसे उस फलेट को खाली करने को कहा था जिसमें वो रह रही है यह अपार्टमेन्ट आशा भोसलें का है जहा बरसों से वो किराये पर रह रही है.फ़िलहाल यह मामला अब कौर्ट में हैं. हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए, अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी (आईफा) द्वारा 2002 में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है.कई हिंदी फिल्मों में उनके पिता का रोल उनके सगे चाचा हरी शिवदासानी ने किया था जो अभिनेत्री बबिता के पिता है(नयी उम्र की नयी फसल के लिए,करिश्मा और करीना के नाना) साधना की चचेरी बहन बबिता ने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा यह बात और है बबिता अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्रभावित थी लिहाजा उन्होंने ने भी साधना स्टाईल को अपनाया बबिता ने फिल्म अभिनेता रंधीर कपूर से शादी कर फिल्मों को अलविदा कह दिया.अपने फ़िल्मी करियर को लेकर साधना बहुत संजीदा थी .She suffered from a disorder of her eyes due to hyperthyroidism
Friday, August 31, 2012
यह देश मांगे गुजराती विकास
सूबे की सेहत ख़राब है तो विकास का क्या मतलब है,गुजरात के विकास का सच ----
एक बार की बात है गुरु ने अपने चेले से कहा जाओ बाज़ार से घी और दही ले आओ,चेले ने अपना दिमाग लगाया और सोचा दो बर्तन क्यों लेकर जाऊ ? एक ही बर्तन में दोनों चीजें आ जायेगी सो उसने पानी पिलाने वाला बर्तन ले लिया (बड़े मटकों में यह आज भी इस्तेमाल किया जाता है दोनों तरफ से एक जैसा पानी में डालने पर किसी भी तरफ से भर लिया जाता है सीध
एक बार की बात है गुरु ने अपने चेले से कहा जाओ बाज़ार से घी और दही ले आओ,चेले ने अपना दिमाग लगाया और सोचा दो बर्तन क्यों लेकर जाऊ ? एक ही बर्तन में दोनों चीजें आ जायेगी सो उसने पानी पिलाने वाला बर्तन ले लिया (बड़े मटकों में यह आज भी इस्तेमाल किया जाता है दोनों तरफ से एक जैसा पानी में डालने पर किसी भी तरफ से भर लिया जाता है सीध
ा रहने पानी नहीं गिरता उल्टा करने पर गिरता है) चेले ने बर्तन लिया और बाज़ार पहुँच गया एक रूपये का घी लिया,अब चेला दही वाले की दुकान पर पहुंचा और दही देने के लिए कहा दुकानदार से कहा दही दे दो जब दुकानदार ने बर्तन मांगा तो चेला ने बर्तन को उलटा कर दिया घी गिर चुका था, उसने दही ले लिया,अब चेला वापस आश्रम पहुंचा,अपने गुरु से बोला गुरु जी लीजिये दही,गुरु जी ने पूछा घी कहाँ है ? चेले ने कहा यह लीजिये घी कह कर उसने बर्तन को उलटा कर दिया,अब दही जमीन पर गिर पड़ा,चेला दही और घी लेने गया,घी लिया, दही की दुकान पर गिरा दिया,दही लिया आश्रम पहुंचा और दही भी गिरा दिया -यह देश मांगे गुजराती विकास
"चाइनीज़ डौल"
लीना
चंदावरकर ने हिंदी फिल्मों में अपनी पारी की शुरुआत सुनील दत्त की फिल्म
*मन का मीत 1968 से की थी इस फिल्म के हीरो थे सुनील दत्त के भाई सोम दत्त
1970 में सास भी कभी बहु थी,ज़वाब,हमजोली,1971 में जाने अनजाने,मैं सुन्दर
हूँ,महबूब की मेहँदी 1972 में प्रीतम,रखवाला,दिल का राजा,1973
मनचली,हनीमून,एक कुंवारा एक कुंवारी,1974 में अनहोनी,ईमान,चोर चोर, 1975
बिदाई,अपने रंग हज़ार,एक महल हो सपनो का,1976 में ब
ैराग,
कैद,जग्गू 1977 में नामी चोर,यारों का यार,आखिरी गोली आफत, 1978 में
नालायक,1980 में ज़ालिम 1985 में सरफ़रोश में अभिनय किया, लीना चंदावरकर
की किस्मत में हर साल एक हिट लिखी थी उस दौर के हर बड़े हीरो के साथ
उन्होंने काम किया,दिलीप कुमार शम्मी कपूर,धर्मेन्द्र,राजेश खन्ना,संजीव
कुमार,विश्वजीत,विनोद खन्ना,शत्रुघन सिन्हा.लीना चंदावरकर का जन्म कर्णाटक
के धारवाड़ में 29 अगस्त 1948 को फौजी परिवार में हुआ था.Fresh Face
फिल्म फेयर कम्टीशन के ज़रिये वो लाइम लाईट में आयी 2007 में सोनी पर दिखाई
दी थी,लीना चंदावरकर का नाम रखवाला की शूटिंग के दौरान धमेद्र के साथ
जुडा,जिसे फ़िल्मी जुबां में गासिप कहा गया .लीना चंदावरकर ने अपने
फ़िल्मी करियर के चड़ते ग्राफ के बीच दिसम्बर 08 1975 को बम्बई में
सिद्धार्थ बांदोडकर के साथ शादी करे सबको चौंका दिया सिद्धार्थ गोवा के
पहले मुख्य मंत्री भाऊ साहेब बांदोडकर के बेटे थे,इस शादी को उस दौर
में फैरी टेल कहा गया था. शाशिकलाताई काकोडकर, सिद्धार्थ की बड़ी बहन थी
और वे भी गोवा की मुख्य मंत्री रही.18 दिसम्बर 1975 को सिद्धार्थ एक
हादसे का शिकार हो गये उनके अपने ही रिवाल्वर से उन्हें गोली लग गयी इस
हादसे से गोवा से लेकर दिल्ली तक तक हडकंप मच गया क्योंकी घायल होने वाला
सिद्धार्थ तब की मुख्य मंत्री का भाई था,पहले गोवा फिर बम्बई में
सिद्धार्थ का इलाज़ हुआ,कई महीने अस्पताल में रहने के बाद वो घर लौट
आये,1976 के बीच में सिद्धार्थ के जखम जो ठीक होने के बाद फिर से उभरे
लिहाजा बम्बई के जसलोक अस्पातल में उन्हें फिर से भर्ती किया गया जहाँ वो 7
नवंबर 1976 को महज़ 26 साल की उम्र में जिंदगी से जंग हर गये.इस मौत से
गोवा थम गया थासिद्धार्थ के अंतिम संस्कार वाले दिन पूरा गोवा बंद था,लोग
शामिल थे सिद्धार्थ की अंतिम यात्रा में, मुख्यमंत्री शाशिकलाताई काकोडकर
ने गोवा में सिद्धार्थ की याद में memorial stands बनवाया जो उनकी माँ
सुनंदाबाई के memorial stands के पास है. Shashikalatai has dedicated the
Siddharth Bhavan in memory of her beloved brother.लीना महज़ 26 साल की
उम्र में विधवा हो चुकी थी,हिंदी फिल्मों से दूर थी.1980 में लीना ने अपनी
उम्र से 20 साल बड़े किशोर कुमार से शादी कर और वो उनकी चौथी और आखिरी
बीबी थी,किशोर और लीना के बेटे का नाम सुमित है 13 अक्टोबर 1987 को 39 साल
की उम्र में लीना फिर विधवा हो गयी,आज कल वे सुमित और अपने सौतेले बेटे
अमित कुमार और अमित की पत्नी और अमित की माँ के साथ रह रही है.लीना को
"चाइनीज़ डौल" भी कहा जाता था .
Thursday, August 9, 2012
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली,गाँधी जी ने सत्य और अहिंसा के बल पर जो मिसाल पेश की उसकी मिसाल दूसरी नहीं है, गाँधी जी ने कभी भी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गाँधी जी बैरिस्टर थे,जिस मकसद को लेकर चले थे गाँधी जी उसे पूरा कर गये .अब बात जेपी बाबू की तो ने विलायत से वापस आने पर कांग्रेस में शामिल हुए, 1932 में civil disobedience ,भारत छोड़ो आन्दोलन 1942 में शामिल रहे, कई साल जेल में रहे, Congress
Socialist Party, में आचार्य नरेन्द्र देव जी के साथ रहे.1954 में आचार्य बिनोभा भावे जी के साथ भूदान आन्दोलन में शामिल रहे, जिस सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा जेपी बाबू ने दिया था वो उसको हासिल कर चुके थे,जून 1975 में दिल्ली के रामलीला मैदान में जो भीड़ जेपी बाबू को सुनने आई थी उससे देखकर रामधारी सिंह दिनकर ने कविता लिखी थी सिंघासन खाली करो के जनता आती है "यह बात और है की टीम अन्ना के कवि कुमार विस्वास जिस भाषा का इस्तेमाल करते है वो पूरा देश जानता है j जेपी बाबू जेल में रहे इमरजेंसी में जनता पार्टी की टूट का कारण यही "दूध की धुली" पार्टी का पुराना अवतार "भारतीय जनसंघ" रही,दोहरी सदस्यता के सवाल पर जनता पार्टी बिखर गयी,और जनता पार्टी की सरकार में भारत के विदेश मंत्री कहाँ हैं "विदेश" में .विदेश में क्यों है ? क्योंकि वो विदेश मंत्री है,यह जुमले मशहूर हुए थे,तब विदेश मंत्री थे श्रीमन अटल बिहारी बाजपेयी (आर.टी.आई. का इस्तेमाल करने वाले धयान दे जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री भारत में कितने दिन रहे और विदेश में कितने महीने? कितने देशों की यात्रा की ? कितना रुपया इस पर खर्चा हुआ (आर.टी.आई.प्लीज़)
गाँधी जी और जेपी बाबू के पैर की जूती भी नहीं है किशन बाबूराव हजारे सिर्फ आठवा पास हैं और गाँधी जी और जेपी बाबू ---------
गाँधी जी और जेपी बाबू के पैर की जूती भी नहीं है किशन बाबूराव हजारे सिर्फ आठवा पास हैं और गाँधी जी और जेपी बाबू ---------
किशोर कुमार अनोखे कलाकार
किशोर कुमार(जन्म:4 अगस्त 1929 निधन:13 अक्तूबर,1987 ) भारतीय सिनेमा के सबसे अनोखे कलाकार रहे हैं। वे लाज़बाव अभिनेता के अलावा बेहतरीन गायक,संगीतकार,निर्माता,निर्देशक के रूप में याद किये जाते हैं । किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को
मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में वहाँ के जाने माने वकील कुंजीलाल के यहाँ हुआ था। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर कुमार अपने भाई बहनों में दूसरे नम्बर पर थे। उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण में खंडवा को याद किया, वे जब भी किसी सार्वजनिक मंच पर या किसी समारोह में अपना कर्यक्रम प्रस्तुत करते थे, शान से कहते थे किशोर कुमार खंडवे वाले, अपनी जन्म भूमि और मातृभूमि के प्रति ऐसा ज़ज़्बा बहुत कम लोगों में दिखाई देता है। शायद बहुत कम लोगों को पाँच रुपया बारह आना वाले गीत की यह असली कहानी मालूम होगी किशोर कुमार इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े थे और उनकी आदत थी कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना। वह ऐसा समय था जब 10-20 पैसे की उधारी भी बहुत मायने रखती थी। किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पाँच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन का मालिक जब उनको अपने पाँच रुपया बारह आना चुकाने को कहता तो वे कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास, और चम्मच बजा बजाकर पाँच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे। बाद में उन्होंने फिल्म चलती का नाम गाडी में इस मुखड़े का बखूबी इस्तेमाल किया था, पाँच रुपया बारह आना । किशोर कुमार की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में फिल्म शिकारी (1946) से हुई.इस फिल्म में उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने प्रमुख भूमिका की थी। उन्हें पहली बार गाने का मौका मिला फिल्म 1948 में बनी फिल्म जिद्दी में। जिसमें उन्होंने देव आनंद के लिए गाना गाया था। किशोर कुमार के. एल. सहगल के ज़बर्दस्त प्रशंसक थे, इसलिए उन्होंने यह गीत उन की शैली में ही गाया। "जिद्दी" की सफलता के बावजूद उन्हें न तो पहचान मिली और न कोई खास काम मिला। उन्होंने 1951 में फणी मजूमदार द्वारा निर्मित फिल्म 'आंदोलन' में हीरो के रूप में काम किया मगर फिल्म फ्लॉप हो गई। 1954 में उन्होंने बिमल राय की 'नौकरी' में एक बेरोजगार युवक की संवेदनशील भूमिका कर अपनी ज़बर्दस्त अभिनय प्रतिभा से भी परिचित किया। इसके बाद 1955 में बनी "बाप रे बाप", 1956 में "नई दिल्ली", 1957 में "मि. मेरी" और "आशा", और 1958 में बनी "चलती का नाम गाड़ी" जिस में किशोर कुमार ने अपने दोनों भाईयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ काम किया और उनकी अभिनेत्री थी मधुबाला। यह भी मजेदार बात है कि किशोर कुमार की शुरुआत की कई फिल्मों में मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार के लिए अपनी आवाज दी थी। मोहम्मद रफी ने फिल्म ‘रागिनी’ तथा ‘शरारत’ में किशोर कुमार को अपनी आवाज उधार दी तो मेहनताना लिया सिर्फ एक रुपया। काम के लिए किशोर कुमार सबसे पहले एस डी बर्मन के पास गए थे. जिन्होंने पहले भी उन्हें 1950 में बनी फिल्म "प्यार" में गाने का मौका दिया था। एस डी बर्मन ने उन्हें फिर "बहार" फिल्म में एक गाना गाने का मौका दिया। कुसुर आप का और यह गाना बहुत हिट हुआ। शुरू में किशोर कुमार को एस डी बर्मन और अन्य संगीत कारों ने अधिक गंभीरता से नहीं लिया और उनसे हल्के स्तर के गीत गवाए गए, लेकिन किशोर कुमार ने 1957 में बनी फिल्म "फंटूस" में दुखी मन मेरे गीत अपनी ऐसी धाक जमाई कि जाने माने संगीतकारों को किशोर कुमार की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ा। इसके बाद एसडी बर्मन ने किशोर कुमार को अपने संगीत निर्देशन में कई गीत गाने का मौका दिया। आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने 'मुनीम जी', 'टैक्सी ड्राइवर', 'फंटूश', 'नौ दो ग्यारह', 'पेइंग गेस्ट', 'गाईड', 'ज्वेल थीफ़', 'प्रेमपुजारी', 'तेरे मेरे सपने' जैसी फिल्मों में अपनी जादुई आवाज से फिल्मी संगीत के दीवानों को अपना दीवाना बना लिया। एक अनुमान के किशोर कुमार ने वर्ष 1940 से वर्ष 1980 के बीच के अपने करियर के दौरान करीब 574 से अधिक गाने गाए। किशोर कुमार ने हिन्दी के साथ ही तमिल, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया फिल्मों के लिए बी गीत गाए। किशोर कुमार को आठ फिल्म फेयर अवार्ड मिले, उनको पहला फिल्म फेयर अवार्ड 1969 में अराधना फिल्म के गीत रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना के लिए दिया गया था। किशोर कुमार की खासियत यह थी कि उन्होंने देव आनंद से लेकर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन के लिए अपनी आवाज दी और इन सभी अभिनेताओं पर उनकी आवाज ऐसी रची बसी मानो किशोर खुद उनके अंदर मौजूद हों। किशोर कुमार ने 81 फ़िल्मों में अभिनय किया और 18 फिल्मों का निर्देशन भी किया। फ़िल्म 'पड़ोसन' में उन्होंने जिस मस्त मौला आदमी के किरदार को निभाया वही किरदार वे जिंदगी भर अपनी असली जिंदगी में निभाते रहे। 1975 में देश में आपातकाल के समय एक सरकारी समारोह में भाग लेने से साफ मना कर देने पर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला ने किशोर कुमार के गीतों के आकाशवाणी से प्रसारित किए जाने पर पर रोक लगा दी थी और किशोर कुमार के घर पर आयकर के छापे भी डाले गए। मगर किशोर कुमार ने आपात काल का समर्थन नहीं किया। यह दुर्भाग्य और शर्म की बात है कि किशोर कुमार द्वारा बनाई गई कई फिल्में आयकर विभाग ने जप्त कर रखी है और लावारिस स्थिति में वहाँ अपनी दुर्दशा पर आँसू बहा रही है। किशोर कुमार ने भारतीय सिनेमा के उस स्वर्ण काल में संघर्ष शुरु किया था जब उनके भाई अशोक कुमार एक सफल सितारे के रूप में स्थापित हो चुके थे। दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद, बलराज साहनी, गुरुदत्त, और रहमान जैसे कलाकारों के साथ ही पार्श्व गायन में मोहम्मद रफी, मुकेश, तलत महमूद और मन्नाडे जैसे दिग्गज गायकों का बोलबाला था। किशोर कुमार की पहली शादी रुमा देवी के से हुई थी, लेकिन जल्दी ही शादी टूट गई और इस के बाद उन्होंने मधुबाला के साथ विवाह किया। उस दौर में दिलीप कुमार जैसे सफल और शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचे अभिनेता जहाँ मधुबाला जैसी रूप सुंदरी का दिल नहीं जीत पाए वही मधुबाला किशोर कुमार की दूसरी पत्नी बनी। 1961 में बनी फिल्म "झुमरु" में दोनों एक साथ आए। यह फिल्म किशोर कुमार ने ही बनाई थी और उन्होंने खुद ही इसका निर्देशन किया था। इस के बाद दोनों ने 1962 में बनी फिल्म "हाफ टिकट" में एक साथ काम किया जिस में किशोर कुमार ने यादगार कॉमेडी कर अपनी एक अलग छबि पेश की। 1976 में उन्होंने योगिता बाली से शादी की मगर इन दोनों का यह साथ मात्र कुछ महीनों का ही रहा। इसके बाद योगिता बाली ने मिथुन चक्रवर्ती से शादी कर ली। 1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बड़ी थीं। मनोज कुमार ने फिल्म उपकार में गीत के लिए किशोर कुमार को गाना गाने के लिए बुलाया तो वह यह कहकर भाग खड़े हुए कि वे तो फिल्म के हीरो के लिए ही गाने गाते हैं, किसी खलनायक पर फिल्माया जाने वाला गाना नहीं गा सकते। लेकिन ' उपकार ' का यह गीत ' कसमे वादे प्यार वफा ...' जब हिट हुआ तो किशोर कुमार मनोज कुमार के पास गए और कहने लगे इतने अच्छे गाने का मौका उन्होने छोड़ दिया। इसके साथ ही उन्होंने यह स्वीकार करने में भी देर नहीं की कि मन्ना डे ने जिस खूबसूरती से इस गाने को गाया है ऐसा तो मैं कई जन्मों तक नहीं गा सकूंगा। अच्छा ही हुआ कि मैने इस गाने को नहीं गाया नहीं तो लोग इतने अच्छे गीत में मन्ना डे की इस खूबसूरत आवाज से वंचित रह जाते। बड़े अजीब थे किशोर कुमार फिल्म छुपा रुस्तम के लिए धीरे से जाना खटमल,तब गाया जब उनके लिए खटिया आई, खटिया पर लेट कर गाना गाया,और जब तक गाने का मेहनताना नहीं मिलता था तब तक गाना नहीं गाते थे कहते थे की गला ख़राब हो गया है और मेहनताना मिलते ही गला ठीक हो जाता था,कहते हैं की किशोर कुमार अपने पलंग पर नोटों की गद्दी बिछाकर सोते थे ,
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