Sunday, September 23, 2012

प्रेम नाम है मेरा,प्रेम चोपड़ा,

प्रेम नाम है मेरा,प्रेम चोपड़ा,
"प्रेम चोपड़ा, हिन्दी फिल्मों के शानदार विलन रहे, उन्होंने 320 फिल्मों में अभिनय किया है.ज्यादातर फिल्मों में खलनायक होने के बावजूद अपने सॉफ्ट स्पोकेन ढ़ंग के लिए मशहूर रहे है. प्रेम चोपड़ा की पैदाइश 23 सितम्बर 1935 को लाहौर में पंजाबी परिवार में हुई थी वो छह बच्चों में तीसरे नम्बर पर थे,बटवारे के बाद,चोपड़ा परिवार लाहौर को छोड़ कर शिमला,आ बसा,उनके पिता रणवीर लाल चोपड़ा,
 चाहते थे की प्रेम डॉक्टर बने उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. फिल्मों में जब प्रेम चोपड़ा आये थे तब विलन के तौर पर प्राण,के.एन.सिंह,,एन.ऐ.अंसारी,मदनपुरी,जीवन,तिवारी, अजीत,का दबदबा था शायद वो पहली बार फिल्म "वो कौन थी "1964 में वो विलेन बने,हम हिन्दुस्तानी 1960 से उन्होंने अपने फ़िल्मी सफ़र नामे को शुरू किया था,1960 में चौधरी कर्नेल सिंह पंजाबी फिल्म में हीरो बने,हेरोइन थी विमला,फिल्म को नेशनल अवार्ड मिला,पर फिल्म बॉक्स आफिस पर औंधे मुह गिर गयी थे,"मुड मुड के न देख" के बाद वो 1962 में नज़र आये फिल्म "मैं शादी करने चला में" प्रेम चोपड़ा ने कामयाबी के लिए लम्बा संघर्ष किया 1967 में जब उपकार सुपर हिट रही और उन्हें यकीन हो गया की अब उन्हें नौकरी नहीं करनी पड़ेगी तो उन्होंने "टाइम्स आफ इंडिया" से इस्तीफा दे दिया.प्रेम चोपड़ा ने अभिनेता प्रेमनाथ(राजेंद्र नाथ,नरेन्द्र नाथ) की बहन से शादी की है राज कपूर प्रेम चोपड़ा के sadu भाई थे,( शोमैन राज कपूर की पत्नी की बहन),प्रेम चोपड़ा की तीन बेटियां हैं: रकिता,पुनीता,और प्रेरणा, पुनीता ने अभिनेता विकास भल्ला से शादी की है, जबकि प्रेरणा चोपड़ा ने अभिनेता शरमन जोशी से शादी की है. दो अनजाने के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार 1976 के लिए मिला था,साल 2004 मैं "भारतीय सिनेमा के लीजेंड" का पुरस्कार मिला इनके अलावा "लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड",1998 में इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी पुरस्कार,"लायंस क्लब पुरस्कार,"अशोक पुरस्कार"आशीर्वाद पुरस्कार "और" पंजाबी कला संगम पुरस्कार से भी सम्मानित भी हो चुके हैं,प्रेम चोपड़ा ने 1960 के दशक से लेकर 1990 तक हीरो के साथ जोड़ी बना कर काम किया,मनोज कुमार,देव आनन्द,धर्मेन्द्र,राजेश खन्ना,अमिताभ बच्चन,गोविंदा के साथ काम किया,1990 के दशक में वो फिल्मों में हास्य और चरित भूमिका में नज़र आने लगे और बिंदु का ज़िर्क किये बगैर नहीं रहा जा सकता डोली 1969 में पहली बार बिंदु ने उनके साथ काम किया था दो रास्ते 1969,कटी पतंग 1970 से बनी यह जोड़ी 19993 तक कई फिल्मों में नजर आई इस जोड़ी की आखिरी फिल्म थी 1993 में आंसू बने अंगारे.

"वो कौन थी " में वो मनोज कुमार के साथ थे शहीद में सुखदेव,पूनम की रात 1965 उपकार 1966,यादगार 1970,पूरब पश्चिम 1971,बेईमान1972, सन्यासी 1975,कार्न्ती 1981,कलयुग और रामायण 1987 क्लर्क,संतोष 1989 में काम किया,फिल्म डोली से राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी बन गयी इस जोड़ी ने 19 फ़िल्में की जिनमें 15 कामयाब रही रही थी,
1991 में रिलीज़ हुई घर परिवार इस जोड़ी की आखिरी फिल्म थी,डोली,दो रास्ते 1969, कटी पतंग 1970 दाग A Poem of Love 1973, अजनबी 1973 प्रेम नगर 1974 महा चोर 1975 महबूबा 1976 ,त्याग1977,आँचल,जानवर,सौतन,मकसद, आवाज़,1984)शत्रु, ऊँचे लोग,घर परिवार,वापसी,बेबस रही, अमिताभ बच्चन के साथ प्यार की कहानी 1971, रास्ते का पत्थर 1972,गहरी चाल 1973 दो अनजाने 1976 ईमान धरम 1977 त्रिशूल 1978 The Great गैम्बलर, काला पत्थर 1979,राम बलराम,दोस्ताना (1980) नसीब 1981 खुददार,देश प्रेमी (1982) अँधा कानून,पुकार(1983)मर्द (1985)शहेंशाह (1988),देव आन्नद के साथ दुनिया (1968) प्रेम पुजारी (1970) हरे रामा हरे कृष्णा (1971) छुपा रुस्तम (1973) डार्लिंग डार्लिंग (1977) देस परदेस (1978) लूटमार (1980) सच्चे का बोल बाला 1989, शशि कपूर के साथ आमने- सामने (1967) एक श्रीमान एक श्रीमती (1969) वचन (1974) दो मुसाफिर (1978) सवाल (1982)बंधन कच्चे धागों का (1983)घर एक मंदिर (1984),शम्मी कपूर के साथ तीसरी मंजिल (1966) लाट साहेब (1967) पगला कहीं का (1970),सुनील दत्त के साथ मेरा साया (1966) पापी (1977) संजीव कुमार के साथ निशान 1965 आधा दिन आधी रात 1977 हाथ्कड़ी 1982,राजकपूर के साथ around the वर्ल्ड 1967 दो जासूस 1975 गोपीचंद जासूस 1982 ,राजेंद्र कुमार के साथ अनजाना (1969) झुक गया आसमान (1968) आप आये बहार आयी1971,गोरा और काला (1972),जीतेन्द्र के साथ वारिस (1969) हिम्मत (1970) जवाब (1970) कसम खून की, दिलदार 1977 दिल और दीवार 1978 निशाना 1980 रक्षा,शाका 1981,प्रेम तपस्या,मवाली (1983)सरफ़रोश (1985),धर्मेन्द्र के साथ,राजा जानी 1972१९७२ )कीमत,जुगनू, झील के उस पार 1973 पाकेट मार 1974 ड्रीम गर्ल 1977 फन्देबाज़ 1978 आज़ाद 1978 अलीबाबा और 40 चोर 1980,आस पास 1981,दो दिशाएं 1982,सितमगर 1985,हुकूमत1987,दिलीप कुमार के साथ दास्तान 1972 बैराग 1976,दुनिया 1984,फ़िरोज़ खान के साथ अपराध 1972 काला सोना 1975 जादू टोना 1977,ऋषि कपूर के साथ बोबी 1973 बारूद 1976 राजा 1975 झूठा कहीं का 1979 धन दौलत 1980 दौलत के दुश्मन 1983 नगीना 1986,प्रेम ग्रन्थ 1996 सनी दयोल के साथ बेताब 1983 मंजिल मंजिल 1984 अर्जुन 1985 सवेरे वाली गाडी 1986 जोशीले 1989, विश्वजीत के साथ सगाई 1966 रविन्द्र कुमार के साथ कुंवारी 1966 किशोर कुमार के साथ की हाय मेरा दिल (1968 ) अजय साहनी समाज को बदल डालो 1970 नूतन के साथ लगान 1971 कबीर बेदी के साथ हलचल 1971, राकेश रोशन के साथ, नफरत 1973 विक्रम जब अँधेरा होता है 1974 विनोद मेहरा के साथ दो झूट 1975 Sansani: The Sensation (1981), विनोद खन्ना के साथ लगाम 1976 ,एक और एक ग्यारह 1981 नविन निश्चल के साथ सबूत (1980)मोहनीश बहल तेरी बाँहों में 1984 हेमा मालिनी के साथ राम तेरा देश 1984 जैकी के साथ आज का दौर, 1985 राज बब्बर के साथ हकीकत,1985, प्रेम चोपड़ा की कुछ और फ़िल्में हैं सिकंदरे ऐ-आज़म 1965,थीफ of Baghdad 1977 भवानी जंक्शन, Bond 303 टेलीफोन, राम तेरे कितने नाम,काली बस्ती,3D Saamri 1985,अविनानाश,प्रीति,इलज़ाम,स्वर्ग से सुन्दर,वापसी 1986, हिरासत,हवालात,इन्साफ की पुकार,मजाल,मर्द की ज़बान,वतन के रखवाले 1987, महावीर,चरणों की सौगंध, शुक्रिया,मेरा मुकदर,मेरा शिकार,गुनाहों का फैसला,सागर संग्राम 1988, सिक्का,दाता, दानापानी, जंगबाज़,अभिमन्यु दूध का क़र्ज़,गरीबों का दाता,रखवाला,इंदिरा,दावपेंच,आखिरी बदला,कानून की आवाज़,कानून का कर्ज़,मिटटी और सोना,घराना,मजबूर,1989 , पाप की कमाई,Police पब्लिक,आतिशबाज़,आज़ाद देश के गुलाम,आग का गोला,काली गंगा 1990,इन्साफ का खून फूल बने अंगारे,मस्तकलंदर, वीरता,1991 घर जमाई,आज का गूंडा राज, तहलका,खिलाडी, त्यागी,बेवफा से वफ़ा, विरोधी,प्रेम दीवाने,मेरे सजना साथ निभाना,खेल 1992 संतान,15th August आजा मेरी जान,इज्ज़त की रोटी,फूल और अंगार,क्षत्रिय,जागृति,आँसू बने अंगारे 1993,Andaz (TV series) आशिकमस्ताने,रघुवीर,जल्लाद,अहंकार,अब इंसाफ होगा,आओ प्यार करें,यार गद्दार,ब्रह्मा,प्रेम योग,बेताज बादशाह, The Law, लाडला,इंसानियत,राजा बाबु,गोपाला,करण,चीता, 1994 दीया और तूफ़ान,ज़माना दीवाना,सपूत,साजन की बाहों में The don, God and Gun आजमाईश,जवाब (1995), हम हैं प्रेमी,दानवीर,Sikander (video) नमक,Return of Jewel Thief मेरा हिंदुस्तान 1996 गुप्त The Hidden Truth (1997)

रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर (23 सितंबर 1908-24 अप्रैल 1974 ) हिन्दी के प्रमुख लेखक. कवि, निबंधकार थे, राष्ट्र कवि दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। बिहार प्रांत के बेगुसराय जिले का सिमरिया घाट कवि दिनकर की जन्मस्थली है। इन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। साहित्य के रूप में इन्होंने संस्कृत, बंग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गह
न अध्ययन किया था। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता।
रामधारी सिंह दिनकर स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने जाते रहे। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है, तो दूसरी ओर कोमल श्रृँगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें कुरूक्षेत्र और उर्वशी में मिलता है।
इनका जन्म 23 सितंबर 1908 को सिमरिया, मुंगेर, बिहार में हुआ था। पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गए। 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। 1950 से1952 तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और इसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने। उन्हें पदमविभूषण की से भी अलंकृत किया गया। पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय के लिये आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कर प्रदान किये गए। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे।
उर्वशी को छोड़कर, दिनकरजी की अधिकतर रचनाएं वीर रस से ओतप्रोत है. उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है. भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि दिनकरजी गैर-हिंदीभाषियों के बीच हिंदी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रतिय थे. उन्होंने कहा कि दिनकरजी अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे. हरिवंश राय बच्चन ने कहा कि दिनकरजी को एक नहीं, चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्हें गद्य, पद्य, भाषा और हिंदी भाषा की सेवा के लिए अलग-अगल ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए. रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा कि दिनकरजी ने देश में क्रांतिकारी आंदोलन को स्वर दिया. नामवर सिंह ने कहा कि दिनकरजी अपने युग के सचमुच सूर्य थे. प्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने कहा कि दिनकरजी की रचनाओं ने उन्हें बहुत प्रेरित किया. प्रसिद्ध रचनाकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि दिनकरजी राष्ट्रवादी और साम्राज्य-विरोधी कवि थे. उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की. एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया.. ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और संबंधों के इर्द-गिर्द धूमती है. उर्वशी स्वर्ग परित्यक्ता एक अपसरा की कहानी है. वहीं, कुरुक्षेत्र, महाभारत के शांति-पर्व का कवितारूप है. यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गई. वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिंतन के अनुरुप हुई है. संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर जी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है, क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है. 1947 में देश स्वाधीन हुआ और वह बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुज़फ़्फ़रपुर पहुँचे। 1952 में जब भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए। दिनकर 12 वर्ष तक संसद-सदस्य रहे, बाद में उन्हें सन 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। लेकिन अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 ई. तक अपना हिन्दी सलाहकार नियुक्त किया और वह फिर दिल्ली लौट आए। फिर तो ज्वार उमरा और रेणुका, हुंकार, रसवंती और द्वंद्वगीत रचे गए। रेणुका और हुंकार की कुछ रचनाऐं यहाँ-वहाँ प्रकाश में आईं और अग्रेज़ प्रशासकों को समझते देर न लगी कि वे एक ग़लत आदमी को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं और दिनकर की फ़ाइल तैयार होने लगी, बात-बात पर क़ैफ़ियत तलब होती और चेतावनियाँ मिला करतीं। चार वर्ष में बाईस बार उनका तबादला किया गया। दिनकरजी को उनकी रचना कुरूक्षेत्र के लिए काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार सम्मान मिला. संस्कृति के चार अध्याय के लिए उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया. भागलपुर विश्वविद्यालय के तात्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानध उपाधि से सम्मानित किया. गुरू महाविद्यालय ने उन्हें विद्या वाचस्पति के लिए चुना. 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूड़ामणि से सम्मानित किया. वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिए उन्हें ज्ञानपीठ सम्मानित किया गया. 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे. मरणोपरांत सम्मान 30 सितंबर 1987 को उनकी 79वीं पुण्यतिथि पर तात्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें श्रद्धांजलित दी. 1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किए. दिनकर जी की स्मृति में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी ने उनकी जन्म शताब्दी के अवसर, रामधारी सिंह दिनकर- व्यक्तित्व और कृतित्व पुस्तक का विमोचन किया. इस किताब की रचना खगेश्वर ठाकुर ने की और भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने इसका प्रकाशन किया. उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी भव्य प्रतिमा का अनावरण किया और उन्हें फूल मालाएं चढाई. कालीकट विश्वविद्यालय में भी इस अवसर को दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया.सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी.
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

काका हाथरसी

काका हाथरसी,18 सितम्बर 1906 ,18 सितम्बर1995) में हाथरस में जन्मे काका हाथरसी ( असली नाम: प्रभुनाथ गर्ग ) हिंदी हास्य कवि थे। उनकी शैली की छाप उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों पर तो पड़ी ही, आज भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं। आपके हिंदी हास्य 42 संग्रह प्रकाशित हुए,1932 के आसपास उन्होंने लिखना शुरू किया था 1935 में, मासिक पत्रिका स
ंगीत का प्रकाशन शुरू कर दिया था.उन्होंने 1985 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था, हर साल, साहित्यिक क्षेत्र में पुरस्कार उत्कृष्ट योगदान काका हाथरसी के नाम पर "हिंदी अकादमी पुरस्कार" दिल्ली सरकार द्वारा दिए जाते हैं हास्य और व्यंग्य की उनकी शैली ने उन्हें लोकप्रिय बना दिया था,आकाशवाणी पर मीठी मीठी हसियां के नाम से,कार्यक्रम पेश होता था जो ग्यारह साल तक चला की यह भारत में सबसे लंबे समय तक चलने का कार्यक्रम था.काका हाथरसी का अपने जन्मदिन, 18 सितंबर, 1995 को 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया. 18 सितंबर को उनकी स्मृति में "हास्य दिवस" घोषित किया गया था और नई दिल्ली में एक पार्क को नाम दिया गया था "काका हाथरसी उद्यान."

बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर

जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर

खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू

पकड़ें टी.टी., गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू

गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना

प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर

काका हाथरसी को यहन भे

‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर

पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला

खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला

कहँ ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा

लाला बोले - भागो , खत्म हो गया आटा

काका हाथरसी का अविस्मरणीय योगदान उनकी सदा याद दिलायेगा।

आशा भोंसले

आशा भोंसले का जन्म 8,सितम्बर 1933 को हुआ था आशा ताई ने अपने कैरियर की शुरुआत 1943 में की थी छह दशकों से ज्यादा लम्बा है उनका कैरियर, 11,000 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों के लिए अपनी आवाज़ दी है-इसके अलावा,कई निजी एल्बम के लिए भी उन्होंने अपनी आवाज दी है, भारत और विदेश में कई संगीत कार्यक्रम में हिस्सा लिया,आशा भोंसले लता मंगेशकर की बहन है, आशा भोंसले अपनी आवाज़ की रेंज के लिए मशहूर हैं फिल्म संगीत, प
ॉप,गजल,भजन,पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय संगीत,लोक गीत,कव्वाली और रवींद्र संगीत और हिन्दी के अलावा, वह 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओँ में अपनी आवाज़ को दर्ज़ करा चुकी है भारत सरकार ने 2000 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 2008 में पदम विभूषण से सम्मानित किया आशा भोसले सांगली, बम्बई अब महाराष्ट्र में गोर के छोटे से गांव में हुआ था,उनके पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर, संगीतकार रंगमंच अभिनेता और शास्त्रीय गायक थे, जब वह नौ साल की थी उनके पिता की मृत्यु हो गई परिवार पुणे से कोल्हापुर और फिर मुंबई आ गया और उसकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने परिवार के लिए फिल्मों में अभिनय करने और गायन का काम शुरू कर दिया था 1943 में अपना पहला गीत मराठी फिल्म माझा बाल के लिए गाया था,इस फिल्म के लिए संगीत दत्ता वात्रेतय़ द्वारा तैयार किया था 1948 में पहली बार हिंदी फिल्म चुनरिया से उन्होंने आगाज़ किया था इस फिल्म के संगीतकार थे हंसराज बहल,रात की रानी 1949 में उन्होंने पहली बार सोलो का मौका मिला था आशा भोंसले ने 16 की उम्र में, 31 साल के गणपतराव भोंसले के साथ शादी कर ली यह शादी परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ थी उन दिनों में गणपतराव लता के निजी सचिव थे यह शादी नाकामयाब रही शादी के कुछ साल बाद, आशा ताई को बाहर कर दिया गया था 1960 के आसपास, गणपतराव ने आशा ताई अपने दो बच्चों और और तीसरा उनके दिनों उनके गर्भ में था के साथ मायके आ गयी अपने बच्चों को पालने के लिए पैसे कमाने के लिए फिल्मों में गाना जारी रखा,उस दौर में गीता दत्त,शमशाद बेगम और लता मंगेशकर का दबदबा था जो गाने कोई नहीं गाता था वो आशा ताई को मिलने लगे 1950 के दशक में, वह बॉलीवुड ’गिनती नहीं लता’ में सबसे पार्श्व गायकों की तुलना में अधिक गीत गाये इनमें से अधिकांश कम बजट बी या सी ग्रेड फिल्मों में थे इन फिल्मों के संगीतकार एआर कुरैशी, सज्ज़ाद हुसैन और गुलाम मोहम्मद हुआ करते थे फिल्म निर्देशक बिमल रॉय ने परिणीता 1953 में गाने का मौका दिया राज कपूर ने मोहम्मद रफी के साथ बूट पॉलिश 1954 में, नन्हे मुन्ने बच्चे के लिए मौका दिया.ओपी नैयर ने आशा ताई को सीआईडी में मौका दिया 1956 में उसके बाद बीआर चोपड़ा की नया दौर, 1957 मांग के साथ तुम्हारा, साथी हाथ बढ़ाना और उड़ें जब जब जुल्फें तेरी, साहिर लुधियानवी के गीतो को मोहम्मद रफी का साथ मिला उन्हें कामयाबी मिली पहली बार उन्होंने फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री के लिए सभी गीत गाये थे बीआर चोपड़ा ने गुमराह 1963, वक्त 1965, हमराज़ 1965, आदमी और इंसान 1966 और धुंध 1973 में मौका दिया,1966 में फिल्म तीसरी मंज़िल के साथ संगीत निर्देशक आरडी बर्मन से उनकी टयूनिंग बन गयी थी डांस नंबर आजा आजा सुना आशा भोंसले ने तो आरडी बर्मन को लगा कि वह इस पाश्चात्य धुन के गाने को नहीं गा सकेंगी लिहाज़ा बर्मन ने इस धुन को बदलने की पेशकश कर दी आशा भोंसले ने मना कर दिया, और इस गीत को चुनौती के रूप में लिया रिहर्सल के दस दिनों के बाद गीत पूरा किया और ओ हसीना ज़ुल्फोंवाली,ओ मेरे सोना रे रफी के साथ सभी तीन युगल के साथ, कामयाब रही 1960 70 के दौरान,हेलेन, जिन पर ओ हसीना जुल्फों वाली फिल्माया गया था हेलेन के लगभग सभी कैबरे न. को आशा ने अपनी आवाज़ दी पिया तू आजा अब कारवां और ये मेरा दिल डॉन, 1980 के दशक तक, भोसले,को स्टोरियोटाईप कैबरे सिंगर और पॉप गायिका के रूप में कोड जाता था, 1981 में वह रेखा अभिनीत फिल्म उमराव ज़ान के लिए दिल चीज़ क्या है, आंखों की मस्ती के,ये क्या जगह हैं दोस्तों,जुस्तज़ू जिसकी थी के लिए अलग शैली तैयार की थी, फिल्म के संगीत निर्देशक खययाम ने जिसका नतीज़ा भी सामने था कभी अपने कैरियर में गज़ल ना गाने वाली आशा को गज़ल गाने के लिए पहला राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड मिला इज़ाज़त 1987 मेरा कुछ सामान के लिए एक और राष्ट्रीय पुरस्कार जीता,1995 में, 62 वर्षीय भोंसले ने फिल्म रंगीला में अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर के लिए गाया था तनहा तनहा,रंगीला रे,संगीत निर्देशक एआर रहमान, के साथ साथ कई गाने रिकॉर्ड हुए 2000 के दशक में लगान का राधा कैसे ना जले 2001, प्यार तूने क्या किया कमबख्त इश्क 2001,ये लम्हा फिलहाल 2002 ,लकी 2005 । संगीत निर्देशकों के साथ भागीदारी,ओ पी नैयर ने आशा के साथ र्कई फिल्मों में लाज़वाब संगीत दिया कई लोगों को दोनों के बीच रोमांटिक रिश्ते का शक भी था नैयर छम छमा छम की संगीत रिकर्डिंग पर पहली बार 1952 में आशा,से मिले थे और फिल्म पहली बार मंगलू 1954 में मौका दिया पर सीआईडी में बड़ा ब्रेक मिला था 1956 में,हालांकि,नया दौर, 1957 की कामयाबी ने इस जोड़ी को मशहूर कर दिया था बताया जाता है के 1959 के बाद, वह भावनात्मक रूप से और पेशेवर तौर पर भी नैयर से जुड़ गयी थी ओ पी नैयर और आशा भोसले की टीम ने कई लाज़वाब गीत दिए तुमसा नहीं देखा 1957 आइये मेहरबान मधुबाला हावड़ा ब्रिज, 1958 एक मुसाफिर एक हसीना 1962, कश्मीर की कली 1964 ये हैं रेशमी जुल्फों का अंधेरा मुमताज मेरे सनम,1965 पर फिल्माया पर फिल्माया हैं आओ हुजूर तुमको किस्मत,और जाइए आप कहाँ;मेरे सनम भी लोकप्रिय थे वे, जैसी कई हिट फिल्मों के लिए गाने भी दर्ज की गई है ओपी नैयर उड़े जब जब जुल्फें, तेरी नया दौर,प्यार का राही हूं एक मुसाफिर एक हसीना, दीवाना हुआ बादल जैसे अपने सबसे लोकप्रिय युगल के लिए आशा भोंसले मोहम्मद रफी की जोड़ी का इस्तेमाल किया कश्मीर की कली इशारों इशारों में आशा ने फिल्म प्राण जाए पर वचन ना जाए 1974 में ओपी नैयर के लिए आखिरी बार गाया चैन से हमको कभी आपने ज़ीने न दिया ज़हर भी माँगा अगर इस गीत को कई अवार्ड मिले पर यह गीत फिल्म में शामिल नहीं किया गया,वे 5 अगस्त, 1972 को अलग हो गये थे,खययाम,खययाम ने आशा की प्रतिभा को पहचाना अपनी पहली फिल्म बीवी 1948 के अलावा खययाम ने 1950 के दशक में दर्द और फिर सुबह होगी,में आशा को मौका दिया लेकिन इस टीम का असली काम उमराव ज़ान के गीतों के लिए याद किया जाताहै। रवि,संगीतकार रवि ने अपने पसंदीदा Female singers में आशा को माना वह अपनी पहली फिल्म वचन 1955 की लोरी चन्दामामा से लेकर घराना,गृहस्थी,वक्त,चौदहवीं का चांद, गुमराह, बहू बेटी, चाइना टाउन, आदमी और इंसान, धुंध और हमराज़ काजल और फूल और पत्थर तक रवि आशा की आवाज़ का बेहतर इस्तेमाल करते रहे, किशोर कुमार के साथ लोकप्रिय गीत कैट माने बिल्ली दिल्ली का ठग का भजन तोरा मन दर्पण काजल आशा रवि के सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक माना जाता है,एक समय था जब संगीतकार आशा को उस वक्त याद करते थे जब बी ग्रेड नायिकाओं पर फिल्माये जाने वाले गाने को रिकॉर्ड करने की जरूरत होती थी,सचिन देव बर्मन बॉलीवुड के सबसे मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन ने आशा को काला पानी, काला बाज़ार,इंसान जाग उठा, लाजवंती,सुजाता और तीन देवियाँ जैसी फिल्मों में कई हिट गाने दिए इन गीतों में से सबसे ज्यादा मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ युगल थे क्या आज भी को फिल्म सुजाता के इस गाने को कोई भूल सकता है तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन पचास हज़ार, बिमल रॉय की बंदिनी 1963 में गीत अब के बरस से उनके स्थिति और मज़बूत हो गयी थी,ज्वेल थीफ 1967 तनूजा पर फिल्माया गया गीत रात अकेली है बहुत लोकप्रिय हुआ था, जयदेव जब एसडी बर्मन के सहायक जयदेव ने जब बतौर जब संगीत निर्देशक के रूप में अपनी पारी की शुरुआत की तो हम दोनों 1961, मुझे जीने दो 1963, पानी 1971 बूँद और अन्य फिल्मों में आशा को ही मौका दिया 1971 में,इस जोड़ी ने आठ गैर फिल्म भक्ति गीत और गजल की एलपी जारी की थी जयदेव की 1987 में उनकी मौत के बाद पर, जयदेव के कम प्रसिद्ध गीतों का संकलन एलबम सुरांजलि जारी किया था । शंकर जयकिशन,शंकर-जयकिशन के साथ आशा को काम करने का कम मौका मिला पर्दे में रहने दो शिकार 1968 आशा को उनका दूसरा फिल्म फेयर पुरस्कार मिला जिंदगी एक सफर हैं सुहाना अंदाज़ 1971 जिसमें उन्होंने यूडलिंग किशोर कुमार के साथ की थी, जब राज कपूर ने मेरा नाम जोकर 1970 में आशा को फिर मौका दिया तब इस बार भी संगीतकार शंकर जयकिशन ही थे.राहुल देव बर्मन उर्फ़ पंचम,आशा ताई पंचम मिले तब वो तीन बच्चों की मां थी उनकी भागीदारी तीसरी मंज़िल 1966 से शुरू हुई थी कैबरे, रॉक, डिस्को, गजल और शास्त्रीय धुनें पर आशा ताई ने अपनी आवाज़ दी 1970 के दशक में, आशा और पंचम की जुगल बंदी ने धूम मचा दी थी कैबरे पिया तू आजा अब कारवां,दम मारो दम हरे रामा हरे कृष्णा,1971 दुनिया में अपना देश, 1972 चुरा लिया है तुमने यादों की बारात, 1973 मेरा कुछ सामान, खाली हाथ शाम आयी हैं,कतरा कतरा 1980 के दशक में इजाज़त से उन्हेंने फिर अवार्ड हासिल किये-आशा को आर डी बर्मन"Bubs" कह कर बुलाते थे 1980 में दोनों ने शादी कर ली राहुल देव बर्मन ने आशा ताई को बंगाली भाषा के लिये कई गानों में मौका दिया,जो हिट रहे,इलैयाराजा,दक्षिण भारतीयी फिल्म संगीतकार इलैयाराजा ने 1980 के दशक की शुरुआत में आशा को फिल्म Moondram 1982 में मौका दिया 1983 में सदमा के नाम से बनी थी और 1990 के दशक के उत्तरार्ध तक जारी रहा इस दौर में अवधि से कई हिट न. तमिल में थे 2000 में, आशा ताई ने कमल हासन की राजनीतिक फिल्म हे राम के लिए थीम गीत गाया गायक हरिहरन के साथ एक युगल गीत भी था,आर ए रहमान,ए आर रहमान और आशा रंगीला 1994 से साथ जुड़े,तनहा तनहा, रंगीला रे जैसे गीत,मुझे दे रंग,राधा कैसे ना जले,लगान,उदित नारायण के साथ युगल, कहीं आग लगे ताल, हे भंवरे की दौड़,केजे येसुदास के साथ युगल,1999 धुआँ,मीनाक्षी, 2004 रहे, अनु मलिक,संगीतकार अनु मलिक और आशा का साथ अन्नू मलिक की पहली फिल्म सोहनी महिवाल 1984 से लेकर अब तक बना हुआ है गौर तलब है की आशा ताई ने अन्नू मलिक के पिता सरदार मलिक के लिए भी गाया था सारंगा 1960 मे,मदन मोहन के साथ मेरा साया 1966 झुमका गिरा रे सलिल चौधरी के साथ जागते रहो 1956 छोटी सी बात 1975 में,जानेमन जानेमन,ष्ठंडी ठंडी सावन की फुहार जैसे मशहूर गीत गए,संगीतकार संदीप चोव्टा के साथ कमबख्त इश्क, फिल्म प्यार तूने क्या किया 2001, गाया आशा ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, नौशाद, रवींद्र जैन,एन दत्ता और हेमंत कुमार जतिन ललित,बप्पी लाहिड़ी,कल्याणजी आनंदजी,उषा खन्ना,चित्रगुप्त,और रोशन के साथ भी काम किया गीतकार गुलजार, संगीत निदेशक आर.डी. बर्मन और आशा भोंसले एक साथ आए थे, डबल एल्बम, दिल पड़ोसी है, जो 8 सितंबर, 1987 को जारी किया गया था.1990 के दशक में, आशा ताई ने remixed आरडी बर्मन गाने के साथ प्रयोग किया. तब खय्याम सहित कई लोगों ने पुरानी धुन के साथ छेड़छाड़ करने के लिए आलोचना की थी. फिर भी, राहुल और मैं जैसे एलबम काफी लोकप्रिय हो गये थे 1997 में, पॉप एलबम लेस्ली लुईस के साथ जनम समझा करो. रिलीज़ हुआ जिसे 1997 एमटीवी पुरस्कार सहित कई पुरस्कार मिले पाकिस्तानी गायक अदनान सामी के नज़र मिलाओ युगल गाया. दोनों एक साथ फिर से साथ आये एलबम बरसे बादल में. एलबम में आठ गाने, भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित हैं.आशा ताई ने कई एलबम के लिए गजलें गाई है मेराज - ऐ - गजल, आबशार -ऐ-ग़ज़ल, कशिश. मेहदी हसन, गुलाम अली, फरीदा खानम और जगजीत सिंह- 2005 में, आशा ने चार ग़ज़ल maestros के लिए श्रद्धांजलि के रूप में एलबम जारी किया . एलबम फरीदा ख़ानम का आज जाने की जिद न करो , गुलाम अली चुपके चुपके, आवारगी और दिल में एक लहर , जगजीत के सिंह आहिस्ता आहिस्ता और मेहदी हसन रंजिश हाय साही, रफ्ता रफ्ता, मुझे तुम नज़र जारी किये इसके अलावा गोल्डन कलेक्शन: यादगार गजल (गैर फिल्म गुलाम अली, आरडी बर्मन और नज़र हुसैन जैसे संगीतकारों द्वारा गजल), गोल्डन कलेक्शन उनके 60 वें जन्मदिन पर , ईएमआई तीन कैसेट जारी किये गये थे .2006 में, एक और एलबम आशा और दोस्त रिलीज़ हुए जिसमें वो फिल्म अभिनेता संजय दत्त और उर्मिला मातोंडकर और प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी ब्रेट ली के साथ है, 1980,1990 के दशक में, आशा ने विश्वयात्रा, के तहत कनाडा, दुबई, ब्रिटेन, अमेरिका और कई अन्य देशों में संगीत कायर्कर्म पेश किये 1989 में, 20 दिनों में 13 अमेरिकी शहरों में प्रदर्शन किया.आशाताई को खाना पकाने का शौक है. वह अक्सर बॉलीवुड हस्तियों के लिए कड़ाई गोश्त और बिरयानी पकती रही हैं आशा ताई के रेस्तरां और दुबई और कुवैत में जो पारंपरिक उत्तर - पश्चिमी भारतीय भोजन उपलब्ध कराता है. आशा ताई बर्मिंघम, ब्रिटेन में हाल ही में एक नया रेस्तरां खोला गया है.आशा भोसले ने सात बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार हासिल किया और 18 बार फ़िल्मफ़ेयर नामांकन मिला वह 1967 और 1968 में अपने पहले दो पुरस्कार जीते. (इस से पहले फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड को मंगेशकर अवॉर्ड कहा जाता था क्योंकि हर बार फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड सिर्फ लता को मिलता था 1967,1968 में आशा ताई ने इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया तो 1969 में लता दीदी ने यह कह कर इस अवॉर्ड के लिए मना कर दिया की नई प्रतिभाओं को बढ़ावा मिलना चाहिए ) 1979 में फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड आशा ताई के हिस्से में गया और उन्होंने ने भी लता दीदी की राह पकड़ ली अनुरोध किया है कि इसके बाद नामांकन के लिए उसके नाम पर विचार नहीं किया जाये 1996 में रंगीला के लिए विशेष पुरस्कार और 2001 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया गया था. आशा और लता ने एक साथ कम ही गाने गाये फिल्म दमन 1951 के लिए पहली बार गया चोरी चोरी,1956,मिस मैरी, 1957,शारदा 1957, मेरे महबूब में क्या नही मेरे मेहबूब, 1963, ऐ काश किसी दीवाने को आए दिन बहार के, 1966,मैं चली मैं चली पड़ोसन, 1968, के बाद छाप तिलक सब मैं तुलसी तेरे आंगन की,1978, दोनों की आवाज़ का जादू एक साथ दिखा उत्सव,1984 में मन क्यों बहका के बाद इन दोनों ने फिर एक साथ नहीं गाया कहा जाता है की लता और आशा के बीच कुछ नाराजगियां थे लता के अपने कैम्प थे बहुत से संगीतकार और निर्माता निर्देशक लता के अलावा किसी और और को मौका नहीं देते फिर भी आशा ने कई लता के खास माने गये संगीतकारों के साथ काम किया ओपी नैयर ही एकलौते संगीतकार रहे जिन्होंने कभी लता को मौका नहीं दिया और वे आशा के साथ हिट पर हिट फिल्में देते रहे,’मंगेशकर बैरियऱ’को पार करने का दम सिर्फ आशा ने ही दिखाया था ’मंगेशकर बैरियर’ ने कई गायाकिओं को दबा दिया था,फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड- 1968: "गरीबों की सुनो" (दस लाख, 1966)-1969: "पर्दे में रहने करो" (शिकार, 1968)-1972: "पिया तू आजा अब" (कारवां, 1971)-1973: "दम मारो दम '(हरे रामा हरे कृष्णा, 1972)- (नैना, 1973) "लगी हैं रात"-1975: "चैन से हमको कभी" (प्राण जाए पर वचन न जाए, 1974)-1979: "ये मेरा दिल" (डॉन, 1978)-विशेष पुरस्कार 1996 -(रंगीला, 1995)-लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार-2001 - फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार- राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार-बेस्ट फिमेल प्लेबैक सिंगर के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दो बार जीता है:-1981: दिल चीज़ क्या है (उमराव जान)-1986: मेरा कुछ सामान (इजाज़त)-आइफा पुरस्कार बेस्ट फिमेल प्लेबैक के लिए आईफा पुरस्कार-2002: "राधा कैसा ना जले" (लगान)-अन्य पुरस्कार- 1987: एशिया कोकिला.पुरस्कार (भारत - पाक एसोसिएशन, ब्रिटेन) -1989: लता मंगेशकर पुरस्कार (मध्य प्रदेश सरकार).-1997: स्क्रीन वीडियोकॉन अवार्ड लिए (एल्बम जानम समझा करो)-1997: एमटीवी पुरस्कार (एलबम जानम समझा करो).-1997: चैनल वी अवार्ड (एलबम जानम समझा करो)-1998: दयावती मोदी पुरस्कार-1999: लता मंगेशकर पुरस्कार (महाराष्ट्र सरकार)-2000: मिलेनियम (दुबई)-2000: जी गोल्ड बॉलीवुड पुरस्कार-2001: एमटीवी पुरस्कार (कमबख्त इश्क के लिए)-2002: बीबीसी लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड-2002: ज़ी सिने अवार्ड सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायन के लिए (लगान राधा कैसे ना जले के लिए)-2002: हॉल ऑफ फेम के लिए जी सिने विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया.-2002: सनसुई मूवी अवार्ड (लगान राधा कैसे ना जले के लिए)-2003: भारतीय संगीत के लिए उत्कृष्ट योगदान के लिए स्वरालय येसुदास पुरस्कार-2004: भारतीय वाणिज्य और उद्योग चैंबर के संघ द्वारा जीवित किंवदंती पुरस्कार.-2005: एमटीवी Immies, आज जाने की जिद न करो के लिए सर्वश्रेष्ठ महिला पॉप-2005: संगीत में सबसे स्टाइलिश.-1997 में, आशा भारतीय विरासत, उस्ताद अली अकबर खान के साथ एलबम के लिए ग्रैमी अवार्ड के लिए नामित 2000 में भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त किया. अमरावती और जलगांव विश्वविद्यालय से साहित्य में डॉक्टरेट की मानद उपाधि.- भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.-2011 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में संगीत के इतिहास में सबसे दर्ज कलाकार के रूप में आधिकारिक तौर पर भोंसले को स्वीकार किया."1947 के बाद से 11,000 एकल, युगल और कोरस समर्थित गाने और 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो रिकॉर्डिंग (एकल)" के लिए सम्मानित किया गया था.

राही मासूम रज़ा

राही मासूम रज़ा (1 सितंबर, 1925-15 मार्च 1992 ) का जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा ' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अली
गढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।1968 से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने आधा गांव , दिल एक सादा कागज , ओस की बूंद , हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1857 जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। आधा गाँव , नीम का पेड़ , कटरा बी आर्ज़ू , टोपी शुक्ला , ओस की बूंद और सीन 75 उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। पिछले कुछ वर्षों प्रसिद्धि में रहीं हिन्दी पॉप गायिका पार्वती खान का विवाह इनके पुत्र नदीम खान, हिन्दी फिल्म निर्देशक एवं सिनेमैटोग्राफर से हुआ था।

के.एन.सिंह

के.एन.सिंह(क्रिशन नारायण सिंह ) का जन्म 01 सितम्बर 1908 को देहरादून (यूपी) में हुआ था, 31 जनवरी 2000 को इस फानी दुनिया को अलविदा कह गये,फिल्मों में आने से पहले, के.एन.सिंह देहरादून में वकालत किया करते थे हिंदी सिनेमा में उनकी शुरुआत सुनहरा संसार (1936) से हुई थी के.एन.सिंह का फ़िल्मी सफर नाम दो हिस्सों में एक आज़ादी से दुसरा आज़ादी के बाद आजादी से पहले वो विलेन नहीं थे आज़ादी के बाद वो विलेन ब
ने उस दौर के सबसे स्टायलिश विलेन थे,बेहतरीन सूट,सर पर हैट और पाइप पीते और एक खास अंदाज़ में साँस उपर खीच कर बोलते के.एन.सिंह ने विलेन को जेंटिलविलेन बना दिया अक्सर वो माफिया डान के किरदार में नजर आते थे लगभग 60 साल तक 200 फिल्मों में काम किया हिन्दुस्तानी सिनेमा में काम किया.बीते ज़माने की चरित्र अभिनेत्री परवीन पौल से के.एन.सिंह ने शादी की थी.के.एन.सिंह ने हर तरह के किरदारों को जिया एक बार उन्होंने ललिता पवार के इतना ज़ोरदार थप्पड़ रसीद किया था की वो फिल्म सेट पर गिर पडी थी उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था और उम्र भर ललिता पवार को यह थप्पड़ याद रहा..इस हादसे के बाद उनका खौफ कई हेरोइन के मन में समाया था,इस हादसे ने ललिता पवार की एक आंख को लगभग बंद कर दिया था जिसका असर ललिता पवार पर उम्र भर रहा,के.एन.सिंह अपने कैरियर के दौरान कभी किसी विवाद में नहीं पड़े जैसा भी रोल मिला कर लिया,उन दिनों मेहनताना कम मिलता था,के.एन.सिंह के साथ भी यही हुआ उन्हें भी आख़िरी वक्त में मुफलिसी का सामना करना पडा था.के.एन.सिंह ने कई फिल्मों में अपनी आँखों का बेहतरीन इस्तेमाल किया, के.एन.सिंह के खानदान में सभी लोग वकील थे उनके पापा चाहते थे वो लन्दन जाकर आगे की पढाई करे पर के.एन.सिंह नहीं माने उन्होंने ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर जंगली जानवरों को पकड़ कर उन्हें बेचने का काम शुरू किया जो कामयाब नहीं हुआ इस नाकामयाबी के बाद वो लखनऊ आ गयी और यहाँ स्नोवाईट के नाम से लांड्री खोल दी और यही उनकी मुलाकात अभिनेता पहाडी सान्याल से हो गयी और इसी दौरान उनकी के.एल.सहगल से हुई जो उन दिनों रेमिंगटन टाइप राइटर कम्पनी के लिए काम करते थे और लखनऊ आते जाते रहते थे लखनऊ में लांड्री के काम में घाटा खाने के बाद के.एन.सिंह रूडकी चले गये वहां एक स्कूल खोल दिया,वो भी नहीं कामयाब हुआ.1935 में अपनी बहन के इलाज़ के लिए वो कलकत्ता पहुंचे जहाँ उन्हें पहाडी सान्याल और के.एल.सहगल से किस्मत ने एक बार फिर मिला दिया.और एक दिन उनकी मुलाकात पृथ्वीराज कपूर से हो गयी पृथ्वीराज कपूर गयी ने देवकी बोस से मुलाक़ात करवा दी यही बस यही चाहते थे के.एन.सिंह ,हिंदी सिनेमा के उस क्लासिक दौर में विलेन की इमेज को ही बदल डाला था उन्होंने पर इस दुनिया की तरह फ़िल्मी दुनिया में होता आया है उनके साथ इन्साफ नहीं हुआ जब वो हीरो के रोल करते तब और विलन बने बाद में वो चरित्र अभिनेता भी बने.

डा. फादर कामिल बुल्के


हिंदी पखवाड़े पर
डा. फादर कामिल बुल्के (Dr. Father Kamil Bulcke) बेल्जियम से भारत आकर मृत्युपर्यंत हिंदी, तुलसी और वाल्मीकि के भक्त रहे । उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1974 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
जन्म: 1 सितंबर 1909, बेल्जियम के पश्चिमी फ्लैंडर्स स्टेट के रम्सकपैले गांव में.
शिक्षा: यूरोप के यूवेन विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग पास की. 1930 में सन्यास
ी बनने का निर्णय लिया.
भारत: नवंबर 1935 में भारत, बंबई पहुंचे। वहां से रांची आ गए। गुमला जिले के इग्नासियुस स्कूल में गणित के अध्यापक बने। वहीं पर हिंदी, ब्रज व अवधी सीखी. 1939 में, सीतागढ/हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखा। 1940 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की।1941 में पुरोहिताभिषेक हुआ, फादर बन गए. 1945 कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी व संस्कृत में बीए पास किया। 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया।
रामकथा: 1949 में डी. फिल उपाधि के लिये इलाहाबाद में ही उनके शोध रामकथा : उत्पत्ति और विकास को स्वीकृति मिली. 1950 में पुनः रांची आ गए। संत जेवियर्स महाविद्यालय में हिंदी व संस्कृत का विभागाध्यक्ष बनाया गया।
सन् 1950 ई. में ही बुल्के ने भारत की नागरिकता ग्रहण की. इसी वर्ष वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की कार्यकारिणी के सदस्य नियुक्त हुये. सन् 1972 ई. से 1977 ई. तक भारत सरकार की केन्द्रीय हिन्दी समिति के सदस्य बने रहे. वर्ष 1973 ई. में उन्हें बेल्जियम की रॉयल अकादमी का सदस्य बनाया गया.
देहान्त : 17 अगस्त 1982 में गैंगरीन के कारण एम्स, दिल्ली में इलाज के दौरान मृत्यु
वक्‍तब्‍य: - भारतीय संदर्भ में बुल्के कहते थे ‘संस्कृत महारानी, हिंदी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी है.’
1949 में रामकथा : उत्पत्ति और विकास,
1955 में हिंदी-अंग्रेजी लघुकोश,
1968 में अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश,
1972 में मुक्तिदाता,
1977 में नया विधान,
1978 में नीलपक्षी, बाइबिल का हिंदी अनुवाद.
पेशे से इंजीनियर रहे डा. फादर कामिल बुल्के का वह ब्योरेवार तार्किक वैज्ञानिकता पर आधारित शोध संकलन साबित करता है कि राम वाल्मीकि के कल्पित पात्र नहीं, इतिहास पुरूष थे. तिथियों में थोडी बहुत चूक हो सकती है. डा. फादर कामिल बुल्के के इस शोधग्रंथ के उर्द्धरणों ने पहली बार साबित किया कि रामकथा केवल भारत में नहीं, अंतर्राष्ट्रीय कथा है. वियतनाम से इंडोनेशिया तक यह कथा फैली हुई है. इसी प्रसंग में फादर बुल्के अपने एक मित्र हॉलैन्ड के डाक्टर होयकास का हवाला देते थे. डा होयकास संस्कृत और इंडोनेशियाई भाषाओं के विद्वान थे. एक दिन वह केंद्रीय इंडोनेशिया में शाम के वक्त टहल रहे थे. उन्होंने देखा एक मौलाना जिनके बगल में कुरान है, इंडोनेशियाई रामायण पढ रहे थे.
डा होयकास ने उनसे पूछा, मौलाना आप तो मुसलमान हैं, आप रामायण क्यों पढते हैं. उस व्यक्ति ने केवल एक वाक्य में उत्तर दिया- ’और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिये!‘ रामकथा के इस विस्तार को फादर बुल्के वाल्मीकि की दिग्विजय कहते थे, भारतीय संस्कृति की दिग्विजय!
17 अगस्त 1982 को हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय आधार स्तंभ फादर कामिल बुल्के के देहांत के पश्चात प्रख्यात विद्वान (अब स्वर्गीय) शंकर दयाल सिंह ने कहा था, जब कभी अब हिन्दी के बारे में कोई संयत विचार होगा,चाहे वह विश्व हिन्दी सम्मेलन के मंच पर हो या केन्द्रीय समिति की बैठक में अथवा किसी विश्वविद्यालय में या कि किसी सभा-समिति में, रह-रहकर सभी को बस एक चेहरा याद आयेगा -फादर कामिल बुल्के का . -फादर कामिल बुल्के के लिये उद्गार में कहे गये तब के ये शब्द आज समूचे हिन्दी जगत पर करारा वयंग्य करते हुये से प्रतीत होते हैं. हिन्दी को इसका उचित सम्मान देने, दिलाने की हमारी प्रतिबद्धता अंग्रेजी रूपी पश्चिमी हवा के झोंकें में विलीन हो चुकी है. ऐसे में -फादर कामिल बुल्के की प्रासंगिकता को गंभीरता से महसूस किये जाने का सवाल ही कहाँ पैदा होता है.
दरअसल एक विदेशी होने के बावजूद -फादर कामिल बुल्के ने हिन्दी की सम्मान वृद्धि,इसके विकास,प्रचार-प्रसार और शोध के लिये गहन कार्य कर हिन्दी के उत्थान का जो मार्ग प्रशस्त किया,और हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने की जो कोशिशें कीं,वह हम भारतीयों के लिये प्रेरणा के साथ-साथ शर्म का विषय भी है. शर्म का विषय इसलिये क्योंकि एक विदेशी होने के बावजूद हिन्दी के लिये उन्होंने जो किया,हम एक भारतीय और एक हिन्दी भाषी होने के बावजूद उसका कुछ अंश भी नहीं कर पाये. इस शर्म को मिटाने के लिये हमारी ओर से और अधिक दृढ-प्रतिज्ञ और एकनिष्ठ होकर हिन्दी हित में कार्य किये जाने की जरूरत थी जो कि वर्तमान माहौल में फिलहाल संभव नहीं हो पा रहा है. हिन्दी जगत के लिये यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. इससे उबरकर हिन्दी के उत्थान के लिये हमें -फादर कामिल बुल्के के पद-चिन्हों पर चलने की जरूरत होगी.