Friday, July 20, 2012

एक थी गीता बाली


गीताबाली,हरकीर्तन कौर (1930 – 21 जनवरी 1965) हिंदी फिल्मों की ब्लैक & -वाईट के दौर की मशहूर अदाकारा रही हैं, गीता बाली का जन्म विभाजन के पूर्व के पंजाब में हुआ था । वह सिख थीं और उनके फ़िल्मों में आने से पहले उनका परिवार काफी गरीबी में रहता था। 1950 के दशक में वह काफी मशहूर अदाकारा थीं,गीताबाली ने बतौर बाल कलाकार अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की थी,लगभग 12 साल की उम्र में,बतौर नायिका उनकी पहली फिल्म थी "बदनामी" जिसने उन्हें स्टार बना दिया था.1948 जलसा,सुहागरात,1949 बड़ी बहन, बन्सरिया,भोली,दुलारी,दिल की दुनिया, गरीबी, गलर्स स्कूल,जलतरंग,किनारा,नेकी और बदी,1950 में थी बावरे नैन जो निर्देशित की थी राजकपूर के गुरु केदार शर्मा ने हीरो राजकपूर,1950 में भाई बहन,गुलनार,निशाना, 1951 में भगवान् दादा के साथ आई थी अलबेला जिसके गाने आज भी मशहूर हैं "शोला जो भड़के दिल मेरा धडके" बाज़ी,बेदर्दी, एक था लड़का,घायल, जौहरी,निरंजन,लचक,नखरे,1952 में आनंदमठ, बहु बेटी,जाल,नज़रिया,राग रंग,ज़लज़ला, 1953 में बाज़,फिरदौस, गुनाह,झमेला,नैना, नया घर,दौर,1954 अमीर,डाकू की लड़की,फेर्री, कवि,सुहागन,1955 अलबेली,छोरा छोरी,फरार,जवाब,मिलाप.मिस कोका कोला, थी शम्मी कपूर के साथ,सौ का नोट,वचन,वरदान,बारादरी,1956
इंस्पेक्टर,लालटेन,पौकेटमार,रगीन रातें, सैलाब,ज़िन्दगी,1957 कॉफ़ी हाउस,जलती निशानी, अजी बस शुक्रिया,1958 जेलर,Ten O'Clockसीआईदी.गर्ल,1959 मोहर,नयी राहें,1961 ,सपने सुहाने, Mr. India 1963 जब से तुमने देखा, 1965 रानो,ढाल यह दोनों फिल्में पूरी नहीं हो सकी,गीता बाली ने अपने वक्त के सभी बड़े नायक-नायिका और निर्देशक के साथ काम किया सुरैया,निम्मी, नलनी जयवंत, मधुबाला,माला सिन्हा, राज कपूर,गुरु दत्त,याकूब,जसवंत,सुरेश, बलराज साहनी,नासिर खान, करण दीवान, अशोक कुमार,भगवान्,देव आनंद,भारत भूषण, प्रदीप कुमार,मोतीलाल,अजीत,शेख मुख्तार,सोहराब मोदी, रहमान,प्रेम अदीब, सज्जन, जय राज,राजेंद्र कुमार, ऐ,आर कारदार, अमिया चक्रबर्ती ,गुरु दत्त,गीताबाली ने दिलीप कुमार के साथ कोई फिल्म नहीं की गुरुदात
गुरुदत्त के साथ काम किया शम्मी कपूर के साथ चार फिल्म की 23 अगस्त 1955 को अपने से दो साल छोटे शम्मी कपूर से शादी कर ली,आदित्य और कंचन बेटे और बेटे फ़िल्मी दुनिया से दूर है, शादी के बाद भी वो फिल्मों में काम करती रही,राजकपूर जो बाद में उनके जेठ बने के साथ बावरे नैन और ससुर पृथ्वीराज कपूर के साथ आनंदमठ में हेरोइन बन कर आई ,21 जनवरी 1965 को उनकी मौत smallpox. की वज़ह से हुई थी, रानो, बन रही थी राजेंद्र सिंह बेदी के मशहूर नावेल एक चादर मैली पर रानो का किरदार मिला था गीता बाली को उनके देवर के किरदार में थे उस वक्त के उभरते कलाकार धर्मेन्द्र की,70 के दौर नायिका योगिता बाली भांजी हैं गीता बाली की,सिर्फ 35 साल की उम्र में गीता बाली ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया,पर ब्लैक & -वाईट का 50 और 60 का दशक उनकी याद दिलाता रहेगा.

निम्मी

निम्मी,1950 और 1960 के दशक की मशहूर अदाकारा रही हैं उस दौर के सभी नामचीन हीरो उनके साथ काम करने के लिए बैचैन रहते थे,उस दौर की हर सामाजिक फिल्म में निम्मी की मौजूदगी रहती थी.निम्मी का असली नाम .नवाब बानू है इनका जन्म आगरा में हुआ था १८ फरवरी १९३३ को,निम्मी की माँ का नाम वहीदन था जो अपने दौर की मशहूर गायिका,अभिनेत्री थी,वालिद अब्दुल हकीम,मिलेट्री में ठेकेदार थे.जब निम्मी केवल नौ वर्ष की थी तब माँ का इंतकाल का हो गया था,और तब उनके वालिद ने Abbottabad (अब पाकिस्तान में)भेज दिया था रहने के लिए दादी के पास. निम्मी के वालिद आगरा छोड़ मेरठ आ गये थे 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद शरणार्थियों की भीड़ में निम्मी औरउनकी दादी भी थी.बरहाल निम्मी दादी के साथ बम्बई आ गयी जहाँ उनकी मौसी ज्योति रहती थी जो की हिंदी फिल्मों में काम करती थी अब बम्बई था नया आशियाना जहाँ एक रिफ्यूजी लडकी इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए तैयार थी,1948 में, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक महबूब खान, सेंट्रल स्टूडियो बम्बई में अपनी फिल्म अंदाज़ की शूटिंग कर रहे थे, अंदाज़ में दिलीप कुमार,राज कपूर के साथ थी नर्गिस पहली और आखिरी बार इन तीनों ने एक साथ काम किया था,निम्मी भी यहाँ मौजूद थी वो अक्सर शूटिंग देखने आती थी.यही उन्हें राज कपूर ने देखा उन दिनों राज कपूर बरसात (1949) के लिए एक नए चेहरा चाहिए था २ण्ड लीड रोल के लिए,अंदाज के सेट पर निम्मी शर्मीला व्यवहार देखने के बाद, बरसात में अभिनेता प्रेम नाथ के साथ निम्मी को ले लिया बरसात में निम्मी हृदयहीन शहरी प्रेम नाथ आदमी को प्यार करती है,निम्मी ने मासूम पहाडी गड़ेरिन की भूमिका निभाई थी. बरसात ने बॉक्स आफिस पर इतिहास बनाया बरसात को अभूतपूर्व महत्वपूर्ण और व्यावसायिक सफलता मिली थी. स्थापित और लोकप्रिय सितारों नरगिस, राज कपूर और प्रेमनाथ की मौजूदगी के बावजूद, निम्मी ने अपना किरदार बखूबी निभाया था,फिल्म के लोकप्रिय शीर्षक गीत "बरसात में हम से मिले तुम"जिया बेक़रार है,पतली कमर है सभी निम्मी पर फ़िल्माये गये थे,बरसात में पहली बार हिन्दी फिल्मों में बलात्कार का सीन सामने आया और यह बलात्कार क्लासिक बन गया. फिल्म का चरमोत्कर्ष भी नवेली अभिनेत्री के इर्द - गिर्द घूमता रहा. बरसात की भारी सफलता ने निम्मी को स्टार बना दिया राजकपूर (भवंरा) , देव आनंद (सज़ा, आँधियाँ) जैसे चोटी के नायकों के साथ काम किया,दीदार (1951) और दाग (1952) जैसी फिल्मों की सफलता के बाद दिलीप कुमार के साथ बहुत लोकप्रिय और भरोसेमंद स्क्रीन जोड़ी साबित हुई. नरगिस,जिनके साथ वह साथ बरसात और दीदार में आई मधुबाला (अमर), सुरैया (शमा), गीता बाली (उषा किरण), और मीना कुमारी (चार दिल चार राहें) के साथ काम किया. निम्मी ने फिल्म बेदर्दी (1951) जिसमें काम किया अपने खुद के गीत गाए,हालांकि यह क्रम जारी नहीं रखा,महबूब खान आन (१९५२) में दिलीप कुमार,प्रेम नाथ और नादिरा के साथ लिया नादिरा की आन पहली फिल्म थी,आन भारतकी पहली टेक्नीकलर फिल्म थी इसके अलावा फिल्म का बजट बहुत बड़ा था यह फिल्म भारत के साथ विदेश में एक साथ रिलीज़ की गयी थी इस फिल्म के वक्त निम्मी की लोकप्रियता का यह आलम था कि इस फिल्म के पहले संपादित फिल्म फाइनेंसरों और वितरकों को दिखाया गया था, उन्होंने शिकायत की कि निम्मी कस चरित्र बहुत जल्दी मर गया है लिहाज़ा आन में सपना फिल्माया गया ताकि निम्मी ज्यादा वक्त परदे पर दिखें आन में निम्मी की मौत और नृत्य लोकप्रिय थे यह पहली हिंदी फिल्म जिसका अत्यंत भव्य प्रीमियर लंदन में हुआ था यहाँ निम्मी भी मौजूद थी आन का अंग्रेजी संस्करण Savage Princess. निम्मी ने Errol Flynn सहित कई पश्चिमी फिल्मी हस्तियों से मुलाकात की. जब फ्लिन उसके हाथ चुंबन करने का प्रयास किया वह इसे दूर खींच लिया, और कहा , "मैं एक भारतीय लड़की हूँ, तुम चुंबन नहीं कर सकते हो!" यह घटना सुर्खियों में आ गयी और लन्दन के प्रेस ने "भारत की unkissed लड़की" के रूप में निम्मी को पेश किया आन की कामयाबी के बाद महबूब खान ने कहा कि अपनी अगली फिल्म अमर (1954) में निम्मी को लिया फिल्म में दिलीप कुमार, मधुबाला भी थे,अमर में भी बलात्कार का सीन निम्मी पर फिल्माया गया, हालांकि फिल्म को व्यावसायिक सफलता नहीं मिल सकी थीनिम्मी ने डंका (1954) के ज़रिये प्रोडक्शन हाउस खोला,कुंदन (1955) बनाई जिसमें सोहराब मोदी के साथ नए नवेले सुनील दत्त भी थे कुंदन में,निम्मी माँ और बेटी की यादगार दोहरी भूमिका निभाई थी,उड़न खटोला (1955), दिलीप कुमार के साथ पांच फिल्मों के बाद आखिरी फिल्म थी,यह उनके कैरियर की सबसे बड़ी बॉक्स ऑफिस सफलता थी,उड़न खटोला के गाने आज भी लोकप्रिय हैं, 1956 में बसंत बहार और भाई भाई के साथ दो बड़ी सफलता थी. 1957 में, 24 साल की उम्र में, निम्मी को भाई भाई में निभाई भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का आलोचक पुरस्कार प्राप्त किया. १९५० के दशक में, निम्मी प्रसिद्ध निर्देशकों चेतन आनंद (अंजलि), के.ए. अब्बास (चार दिल चार राहें) और विजय भट्ट अंगुलिमाल के साथ काम किया.निम्मी ने उस दौर में जोखिम भी लिए कुछ गलतियाँ भी की,चार दिल चार राहें (1959) वेश्या के रूप में नज़र आई,जबकि बीआर चोपड़ा की "साधना" (1958), को उन्होंने खारिज कर दिया,1963 में "वो कौन थी"भी ठुकरा दी, "साधना" ने वैजयन्ती माला को चमकाया और वो कौन थी ने साधना को चमकाया दोनों बार निम्मी साधना से हारी एक बार साधना फिल्म से तो दूसरी बार साधना हेरोइन से,निम्मी फिर गलत फैसला कर चुकी थी अब मौक़ा था हरनाम सिंह रवैल की मेरे महबूब का यह बड़े बजट की मुस्लिम सब्जेक्ट पर बनने वाली रंगीन फिल्म थी,जो रोल साधना ने निभाया वो पहले निम्मी को मिला था निम्मी का रोल बीना राय को मिला निम्मी फिर चुक गयी फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने कहा था "Initially I was offered Sadhana's role and Bina Rai was to do my role. However I opted for the role of the sister as I felt it was the back bone of the story and had scope for acting. Though it didn't turn out the way I had visualised it." In rejecting the female lead, opposite a hugely popular leading man, Rajendra Kumar, for what was ostensibly a character role, Nimmi lost a valuable chance at making the successful transition into the new phase of films that were then evolving. The role Nimmi rejected was played by Sadhana and was instrumental in placing her among the most successful heroines of the 1960s. Nimmi did receive a Filmfare award nomination for best supporting actress for her performance and Mere Mehboob went on to be one of the biggest hits of 1963 at the box-office. 1960 के दशक में, साधना, नंदा, आशा पारेख, माला सिन्हा और सायरा बानो जैसी मॉड अभिनेत्रियों की नई नस्ल हिंदी फिल्मों में नायिका बन कर आने लगी थी नायिका की अवधारणा बदल रही थी, पूजा के फूल (1964) में अंधी लड़की का रोल और अशोक कुमार के साथ आकाशदीप (1965) में मूक पत्नी रिलीज़ हुई,एक स्टार के रूप में निम्मी की लोकप्रियता कम होने लगी थी.उन्होंने शादी कर फिल्मों को अलविदाकह दिया,के. आसिफ की लव & गौड़ थी उनके पास जो लैला-मजनू की कहानी पर आधारित थी, मुगल - ए - आजम (1960) के बाद के.आसिफ लव & गौड़ पर काम कर रहे थे निम्मी लैला के रोल में थी और गुरु दत्त मजनू के रूप में ,पर गुरु दत्त की ख़ुदकुशी के बाद इस फिल्म की शूटिंग पर पड़ाव पड़ गया,संजीव कुमार को मजनू के रोल में लिया गया काम शुरू हुआ कुछ दिन के बाद के.आसिफ का इंतकाल हो गया,अब इस फिल्म को मनहूस मान लिया गया.आधी अधूरी फिल्म 6 जून 1986 को रिलीज़ हुए तब संजीव कुमार इस दुनिया में नहीं थे.क.आसिफ की बेवा अख्तर आसिफ ने इसे रिलीज़ करवाया था.एक बेहतरीन फिल्म जो टेक्नीकलर में थी पहले ही दिन दम तोड़ गयी सू विवाद और अटकलों से घिरी थी निम्मी की जाती जिन्दगी दिलीप कुमार,के साथ निराधार अफवाहें और और कहानियां सामने आई थी कहते हैं की दिलीप कुमार, के निम्मी और मधुबाला दोनों से रिश्ते थे जबकी निम्मी का प्यार थे लेखक एस अली रजा, जिन्होंने उनकी फिल्मों के लिए संवाद लिखे के बरसात (1949), आन (1952) और अमर (1954). एस अली रजा बॉलीवुड के प्रसिद्ध कहानी, संवाद और पटकथा लेखक आगाजानी (कश्मीरी ) के भतीजे थे,दोनों लखनऊ से थे. एस.अली रजा की क 1 नवंबर 2007 को 85 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी थी, विधवा निम्मी अब तनहा मुबई में रह रही है. जून 1991 में सुर्खियों में निम्मी फिर से तब आई जब यह खबर आई अभिनेत्री किमी काटकर निम्मी की बेटी है, लेकिन कोई और सबूत सामने नहीं आया यह दावा इसलिए भी किया गया होगा की है, किमी काटकर कस का चेहरा" निम्मी से मिलता जुलता है आज कल निम्मी के पास तनहाई के सिवा कुछ भी नहीं है.निम्मी को 1950 के दशक की महान अग्रणी महिलाओं में से एक माना जाता है. बरसात (1949) वफ़ा , राज मुकुट, जलते दीप (1950) सज़ा (1951) दीदार (1951) बुज़दिल (1951) बेदर्दी (1951) बड़ी बहू (1951) उषा Kiron (1952) दाग (1952) आँधियाँ (1952) आन (1952) हमदर्द (1953) अलिफ़ लैला (1953) Aabshar (1953) प्यासे नैन (1954) कस्तूरी (1954) डंका (1954) अमर (1954) उड़न खटोला (1955) समाज (1955) कुंदन (1955) चार पैसे (1955) भागवत महिमा (1955) राजधानी (1956) भाई भाई (1956) बसंत बहार (1956) अंजलि (1957) छोटे बाबू (1957) सोहनी महिवाल (1958) पहली रात (1959) चार दिल चार राहें (1959) अंगुलिमाल (1960). शम्मा (1961) मेरे मेहबूब (1963) पूजा के फूल (1964) दाल में काला (1964) आकाशदीप (1965) लव&GOD (1986)

वक्त ने किया क्या हंसी सितम....


गीतादत्त को गुज़रे 40 साल हो गये हैं,महज़ 42 साल की उम्र में दुनिया को उस वक्त अलविदा कहा जब उनके बच्चे छोटे थे,शौहर था उनकी ज़िन्दगी में जिसे उन्होंने कभी टूट कर चाहा था,शौहर दूसरी औरत के लिए पागल हो गया था,शौहर की खुदकुशी के बाद जिस दौलत और कम्पनी की मालियत उन्हें और उनके बच्चों को मिलनी थी वो सब कुछ उन्हें नहीं मिला शौहर के भाई सब ले गये,गम गलत करने के लिए शराब का सहारा लिया जब होश आया तीन बच्चों की ज़िम्मेदारी है उनके कन्धों पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी,1950 के मध्य से ही कुछ न कुछ वजहों से वो फ़िल्मी दुनिया से धीरे धीरे अलग हो रही थी.जिसने हरेक गाने को अपने अंदाज़ में गाया. नायिका, सहनायिका, खलनायिका, नर्तकी या रस्ते की बंजारिन, हर किसी के लिए अलग रंग और ढंग के गाने गाये. "नाचे घोड़ा नाचे घोड़ा, किम्मत इसकी बीस हज़ार मैं बेच रही हूँ बीच बाज़ार" आज से साठ साल पहले बना हैं और फिर भी तरोताजा हैं. "आज की काली घटा" सुनते हैं तो लगता है सचमुच बाहर बादल छा गए हैं. तब लोग कहते थे गीता गले से नहीं दिल से गाती थी! गीता दत्त का नाम ऐसी पा‌र्श्वगायिका के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने अपनी दिलकश आवाज की कशिश से लगभग तीन दशकों तक करोड़ों श्रोताओं को मदहोश किया। फिल्म जगत में गीता दत्त के नाम से मशहूर गीता घोष राय चौधरी महज 12 वर्ष की थी तब उनका पूरा परिवार फरीदपुर (अब बंगलादेश) से 1942 में बम्बई (अब मुंबई) आ गया। उनके पिता देबेन्द्रनाथ घोष रॉय चौधरी ज़मींदार थे ,गीता के कुल दस भाई बहन थे जमींदार थे। बचपन के दिनों से ही गीता राय का रूझान संगीत की ओर था और वह पा‌र्श्वगायिका बनना चाहती थी। गीता राय ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हनुमान प्रसाद से हासिल की। 23 नवंबर 1930 में फरीदपुर शहर में जन्मी गीता राय को सबसे पहले वर्ष 1946 में फिल्म भक्त प्रहलाद के लिए गाने का मौका मिला। गीता राय ने कश्मीर की कली, रसीली, सर्कस किंग (1946) जैसी कुछ फिल्मो के लिए भी गीत गाए लेकिन इनमें से कोई भी बॉक्स आफिस पर सफल नही हुई। इस बीच उनकी मुलाकात महान संगीतकार एस डी बर्मन से हुई। गीता रॉय मे एस डी बर्मन को फिल्म इंडस्ट्री का उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और उन्होंने गीता राय से अपनी अगली फिल्म दो भाई के लिए गाने की पेशकश की। वर्ष 1947 में प्रदर्शित फिल्म दो भाई गीता राय के सिने कैरियर की अहम फिल्म साबित हुई और इस फिल्म में उनका गाया यह गीत मेरा सुंदर सपना बीत गया. लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। फिल्म दो भाई मे अपने गाये इस गीत की कामयाबी के बात बतौर पा‌र्श्वगायिका गीता राय अपनी पहचान बनाने में सफल हो गई। वर्ष 1951 गीता राय के सिने कैरियर के साथ ही व्यक्तिगत जीवन में भी एक नया मोड़ लेकर आया। फिल्म बाजी के निर्माण के दौरान उनकी मुलाकात निर्देशक गुरूदत्त से हुई। फिल्म के एक गाने तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले की रिर्काडिंग के दौरान गीता राय को देख गुरूदत्त फ़िदा हो गए। फिल्म बाजी की सफलता ने गीता राय की तकदीर बना दी और बतौर पा‌र्श्व गायिका वह फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गई। गीता राय भी गुरूदत्त से प्यार करने लगी। वर्ष 1953 में गीता राय ने गुरूदत्त से शादी कर ली। गीता राय से वो बन गयी थी गीता दत्त, साल 1956 गीता दत्त के सिने कैरियर में एक अहम पड़ाव लेकर आया। हावड़ा ब्रिज के संगीत निर्देशन के दौरान ओ पी नैयर ने ऐसी धुन तैयार की थी जो सधी हुयी गायिकाओं के लिए भी काफी कठिन थी। जब उन्होने गीता दत्त को "मेरा नाम चिन चिन चु" गाने को कहा तो उन्हे लगा कि वह इस तरह के पाश्चात्य संगीत के साथ तालमेल नहीं बिठा पायेंगी। लेकिन उन्होने इसे एक चुनौती की तरह लिया और इसे गाने के लिए उन्होंने पाश्चात्य गायिकाओ के गाये गीतों को भी बारीकी से सुनकर अपनी आवाज मे ढालने की कोशिश की और बाद में जब उन्होंने इस गीत को गाया तो उन्हें भी इस बात का सुखद अहसास हुआ कि वह इस तरह के गाने गा सकती है। गीता दत्त के पंसदीदा संगीतकार के तौर पर एस डी बर्मन का नाम सबसे पहले आता है 1गीता दत्त और एस डी बर्मन की जोड़ी वाली गीतो की लंबी फेहरिस्त में कुछ है .मेरा सुंदर सपना बीत गया (दो भाई- 1947), तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे (बाजी-1951), चांद है वही सितारे है वही गगन (परिणीता-1953), जाने क्या तुने सुनी जाने क्या मैने सुनी, हम आपकी आंखों मे इस दिल को बसा लें तो (प्यासा-1957), वक्त ने किया क्या हसीं सितम (कागज के फूल-1959) जैसे न भूलने वाले गीत शामिल है। गीता दत्त के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी संगीतकार ओ.पी.नैयर के साथ भी पसंद की गई। ओ पी नैयर के संगीतबद्ध जिन गीतों को गीता दत्त ने अमर बना दिया उनमें कुछ है, सुन सुन सुन जालिमा, बाबूजी धीरे चलना, ये लो मै हारी पिया, मोहब्बत कर लो जी भर लो, (आरपार-1954), ठंडी हवा काली घटा, जाने कहां मेरा जिगर गया जी, (मिस्टर एंड मिसेज 55-1955), आंखो हीं आंखो मे इशारा हो गया, जाता कहां है दीवाने (सीआईडी-1956), मेरा नाम चिन चिन चु (हावड़ा ब्रिज-1958), तुम जो हुये मेरे हमसफर (12ओ क्लाक-1958), जैसे न भूलने वाले गीत शामिल है।जिस साल फिल्म "दो भाई" प्रर्दशित हुई उसी साल फिल्मिस्तान की और एक फिल्म आयी थी जिसका नाम था शहनाई. दिग्गज संगीतकार सी रामचन्द्र ने एक फडकता हुआ प्रेमगीत बनाया था "चढ़ती जवानी में झूलो झूलो मेरी रानी, तुम प्रेम का हिंडोला". इसे गाया था खुद सी रामचंद्र, गीता रॉय और बीनापानी मुख़र्जी ने. कहाँ "दो भाई" के दर्द भरे गीत और कहाँ यह प्रेम के हिंडोले! गीतकार राजेंदर किशन की कलम का जादू हैं इस प्रेमगीत में जिसे संगीतबद्ध किया हैं सचिन देव बर्मन ने. "एक हम और दूसरे तुम, तीसरा कोई नहीं, यूं कहो हम एक हैं और दूसरा कोई नहीं". इसे गाया हैं किशोर कुमार और गीता रॉय ने फिल्म "प्यार" के लिए जो सन १९५० में आई थी. गीत फिल्माया गया था राज कपूर और नर्गिस पर."हम तुमसे पूंछते हैं सच सच हमें बताना, क्या तुम को आ गया हैं दिल लेके मुस्कुराना?" वाह वाह क्या सवाल किया हैं. यह बोल हैं अंजुम जयपुरी के लिए जिन्हें संगीतबद्ध किया था चित्रगुप्त ने फिल्म हमारी शान के लिए जो १९५१ में प्रर्दशित हुई थी. बहुत कम संगीत प्रेमी जानते हैं की गीता दत्त ने सबसे ज्यादा गीत संगीतकार चित्रगुप्त के लिए गाये हैं. यह गीत गाया हैं मोहम्मद रफी और गीता ने. रफी और गीता दत्त के गानों में भी सबसे ज्यादा गाने चित्रगुप्त ने संगीतबद्ध किये हैं.भले गाना पूरा अकेले गाती हो या फिर कुछ थोड़े से शब्द, एक अपनी झलक जरूर छोड़ देती थी. "पिकनिक में टिक टिक करती झूमें मस्तों की टोली" ऐसा युगल गीत हैं जिसमें मन्ना डे साहब और साथी कलाकार ज्यादा तर गाते हैं , और गीता दत्त सिर्फ एक या दो पंक्तियाँ गाती हैं. इस गाने को सुनिए और उनकी आवाज़ की मिठास और हरकत देखिये. ऐसा ही गाना हैं रफी साहब के साथ "ए दिल हैं मुश्किल जीना यहाँ" जिसमे गीता दत्त सिर्फ आखिरी की कुछ पंक्तियाँ गाती हैं. "दादा गिरी नहीं चलने की यहाँ.." जिस अंदाज़ में गाया हैं वो अपने आप में गाने को चार चाँद लगा देता हैं. ऐसा ही एक उदाहरण हैं एक लोरी का जिसे गीता ने गया हैं पारुल घोष जी के साथ. बोल हैं " आ जा री निंदिया आ", गाने की सिर्फ पहली दो पंक्तियाँ गीता के मधुर आवाज़ मैं हैं और बाकी का पूरा गाना पारुल जी ने गाया हैं.बात हो चाहे अपने से ज्यादा अनुभवी गायकों के साथ गाने की (जैसे की मुकेश, शमशाद बेग़म और जोहराजान अम्बलावाली) या फिर नए गायकोंके साथ गाने की (आशा भोंसले, मुबारक बेग़म, सुमन कल्याणपुर, महेंद्र कपूर या अभिनेत्री नूतन)! न किसी पर हावी होने की कोशिश न किसीसे प्रभावित होकर अपनी छवि खोना. अभिनेता सुन्दर, भारत भूषण, प्राण, नूतन, दादामुनि अशोक कुमार जी और हरफन मौला किशोर कुमार के साथ भी गाने गाये!चालीस के दशक के विख्यात गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ तो इतने ख़ूबसूरत गाने गाये हैं मगर दुर्भाग्य से उनमें से बहुत कम गाने आजकल उपलब्ध हैं. ग़ज़ल सम्राट तलत महमूद के साथ प्रेमगीत और छेड़-छड़ भरे मधुर गीत गायें. इन दोनों के साथ संगीतकार बुलो सी रानी द्वारा संगीतबद्ध किया हुआ "यह प्यार की बातें यह आज की रातें दिलदार याद रखना" बड़ा ही मस्ती भरा गीत हैं, जो फिल्म बगदाद के लिए बनाया गया था. इसी तरह गीता ने तलत महमूद के साथ कई सुरीले गीत गायें जो आज लगभग अज्ञात हैं.जब वो गाती थी "आग लगाना क्या मुश्किल हैं" तो सचमुच लगता हैं कि गीता की आवाज़ उस नर्तकी के लिए ही बनी थी. गाँव की गोरी के लिए गाया हुआ गाना "जवाब नहीं गोरे मुखडे पे तिल काले का" (रफी साहब के साथ) बिलकुल उसी अंदाज़ में हैं. उन्ही चित्रगुप्त के संगीत दिग्दर्शन में उषा मंगेशकर के साथ गाया "लिख पढ़ पढ़ लिख के अच्छा सा राजा बेटा बन". और फिर उसी फिल्म में हेलन के लिए गाया "बीस बरस तक लाख संभाला, चला गया पर जानेवाला, दिल हो गया चोरी हाय..."! सन १९४९ में संगीतकार ज्ञान दत्त का संगीतबद्ध किया एक फडकता हुआ गीत "जिया का दिया पिया टीम टीम होवे" शमशाद बेग़म जी के साथ इस अंदाज़ में गाया हैं कि बस! उसी फिल्म में एक तिकोन गीत था "उमंगों के दिन बीते जाए" जो आज भी जवान हैं. वैसे तो गीता दत्त ने फिल्मों के लिए गीत गाना शुरू किया सन 1946 में, मगर एक ही साल में फिल्म दो भाई के गीतों से लोग उसे पहचानने लग गए. अगले पांच साल तक गीता दत्त, शमशाद बेग़म और लता मंगेशकर सर्वाधिक लोकप्रिय गायिकाएं रही. अपने जीवन में सौ से भी ज्यादा संगीतकारों के लिए गीता दत्त ने लगभग सत्रह सौ गाने गाये.अपनी आवाज़ के जादू से हमारी जिंदगियों में एक ताज़गी और आनंद का अनुभव कराने के लिए संगीत प्रेमी गीता दत्त को हमेशा याद रखेंगे.गीता रॉय (दत्त) ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत प्रेमगीत गाये हैं मगर जिनके बारे में या तो कम लोगों को जानकारी हैं या संगीत प्रेमियों को इस बात का शायद अहसास नहीं है. इसीलिए आज हम गीता के गाये हुए कुछ मधुर मीठे प्रणय गीतों की खोज करेंगे. गीता दत्त और किशोर कुमार ने फिल्म मिस माला (१९५४)के लिए, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में. "नाचती झूमती मुस्कुराती आ गयी प्यार की रात" फिल्माया गया था खुद किशोरकुमार और अभिनेत्री वैजयंती माला पर. रात के समय इसे सुनिए और देखिये गीता की अदाकारी और आवाज़ की मीठास. कुछ संगीत प्रेमियों का यह मानना हैं कि यह गीत उनका किशोरकुमार के साथ सबसे अच्छा गीत हैं. गौर करने की बात यह हैं कि गीता दत्त ने अभिनेत्री वैजयंती माला के लिए बहुत कम गीत गाये हैं. सन १९५५ में फिल्म सरदार का यह गीत बिनाका गीतमाला पर काफी मशहूर था. संगीतकार जगमोहन "सूरसागर" का स्वरबद्ध किया यह गीत हैं "बरखा की रात में हे हो हां..रस बरसे नील गगन से". उद्धव कुमार के लिखे हुए बोल हैं. "भीगे हैं तन फिर भी जलाता हैं मन, जैसे के जल में लगी हो अगन, राम सबको बचाए इस उलझन से".कुछ साल और पीछे जाते हैं सन १९४८ में. संगीतकार हैं ज्ञान दत्त और गाने के बोल लिखे हैं जाने माने गीतकार दीना नाथ मधोक ने. जी हाँ, फिल्म का नाम हैं "चन्दा की चांदनी" और गीत हैं "उल्फत के दर्द का भी मज़ा लो". १८ साल की जवान गीता रॉय की सुमधुर आवाज़ में यह गाना सुनते ही बनता है. प्यार के दर्द के बारे में वह कहती हैं "यह दर्द सुहाना इस दर्द को पालो, दिल चाहे और हो जरा और हो". लाजवाब! प्रणय भाव के युगल गीतों की बात हो रही हो और फिल्म दिलरुबा का यह गीत हम कैसे भूल सकते हैं? अभिनेत्री रेहाना और देव आनंद पर फिल्माया गया यह गीत है "हमने खाई हैं मुहब्बत में जवानी की कसम, न कभी होंगे जुदा हम". चालीस के दशक के मशहूर गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ गीता रॉय ने यह गीत गाया था सन 1950 में. आज भी इस गीत में प्रेमभावना के तरल और मुलायम रंग हैं. दुर्रानी और गीता दत्त के मीठे और रसीले गीतों में इस गाने का स्थान बहुत ऊंचा हैं.गीतकार अज़ीज़ कश्मीरी और संगीतकार विनोद (एरिक रॉबर्ट्स) का "लारा लप्पा" गीत तो बहुत मशहूर हैं जो फिल्म "एक थी लड़की में" था. उसी फिल्म में विनोद ने गीता रॉय से एक प्रेमविभोर गीत गवाया. गाने के बोल हैं "उनसे कहना के वोह पलभर के लिए आ जाए". एक अद्भुत सी मीठास हैं इस गाने में. जब वाह गाती हैं "फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाए, हाय, फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाए" तब उस "हाय" पर दिल धड़क उठता हैं.सन १९४८ में पंजाब के जाने माने संगीतकार हंसराज बहल के लिए फिल्म "चुनरिया" के लिए गीता ने गाया था "ओह मोटोरवाले बाबू मिलने आजा रे, तेरी मोटर रहे सलामत बाबू मिलने आजा रे". एक गाँव की अल्हड गोरी की भावनाओं को सरलता और मधुरता से इस गाने में गीता ने अपनी आवाज़ से सजीव बना दिया है.सन 1950 में फिल्म "हमारी बेटी" के लिए जवान संगीतकार स्नेहल भाटकर (जिनका असली नाम था वासुदेव भाटकर) ने मुकेश और गीता रॉय से गवाया एक मीठा सा युगल गीत "किसने छेड़े तार मेरी दिल की सितार के किसने छेड़े तार". भावों की नाजुकता और प्रेम की परिभाषा का एक सुन्दर उदाहरण हैं यह युगल गीत जिसे लिखा था रणधीर ने.बावरे नैन फिल्म में संगीतकार रोशन को सबसे पहला सुप्रसिद्ध गीत (ख़यालों में किसी के) देने के बाद अगले साल गीता रॉय ने रोशन के लिए फिल्म बेदर्दी के लिए गाया "दो प्यार की बातें हो जाए, एक तुम कह दो, एक हम कह दे". बूटाराम शर्मा के लिखे इस सीधे से गीत में अपनी आवाज़ की जादू से एक अनोखी अदा बिखेरी हैं गीता रोय ने.पाश्चात्य धुन पर थिरकता हुआ एक स्वप्नील प्रेमगीत हैं फिल्म ज़माना (१९५७) से जिसके संगीत निर्देशक हैं सलील चौधरी और बोल हैं "दिल यह चाहे चाँद सितारों को छूले ..दिन बहार के हैं.." उसी साल प्रसिद्द फिल्म बंदी का मीठा सा गीत हैं "गोरा बदन मोरा उमरिया बाली मैं तो गेंद की डाली मोपे तिरछी नजरिया ना डालो मोरे बालमा". हेमंतकुमार का संगीतबद्ध यह गीत सुनने के बाद दिल में छा जाता है.संगीतकार ओमकार प्रसाद नय्यर (जो की ओ पी नय्यर के नाम से ज्यादा परिचित है) ने कई फिल्मों को फड़कता हुआ संगीत दिया. अभिनेत्री श्यामा की एक फिल्म आई थी श्रीमती ४२० (१९५६) में, जिसके लिए ओ पी ने एक प्रेमगीत गवाया था मोहम्मद रफी और गीता दत्त से. गीत के बोल है "यहाँ हम वहां तुम, मेरा दिल हुआ हैं गुम", जिसे लिखा था जान निसार अख्तर ने.आज के युवा संगीत प्रेमी शायद शंकरदास गुप्ता के नाम से अनजान है. फिल्म आहुती (1950) के लिए गीता राय ने शंकरदास गुप्ता के लिए युगल गीत गाया था "लहरों से खेले चन्दा, चन्दा से खेले तारे". उसी फिल्म के लिए और एक गीत इन दोनों ने गाया था "दिल के बस में हैं जहां ले जाएगा हम जायेंगे..वक़्त से कह दो के ठहरे बन स्वर के आयेंगे". एक अलग अंदाज़ में यह गीत स्वरबद्ध किया हैं, जैसे की दो प्रेमी बात-चीत कर रहे हैं. गीता अपनी मदभरी आवाज़ में कहती हैं -"चाँद बन कर आयेंगे और चांदनी फैलायेंगे"."दिल-ऐ-बेकरार कहे बार बार,हमसे थोडा थोडा प्यार भी ज़रूर करो जी". इस को गाया हैं गीता दत्त और गुलाम मुस्तफा दुर्रानी ने फिल्म बगदाद के लिए और संगीतबद्ध किया हैं बुलो सी रानी ने. जिस बुलो सी रानी ने सिर्फ दो साल पहले जोगन में एक से एक बेहतर भजन गीता दत्त से गवाए थे उन्हों ने इस फिल्म में उसी गीता से लाजवाब हलके फुलके गीत भी गवाएं. और जिस राजा मेहंदी अली खान साहब ने फिल्म दो भाई के लिखा था "मेरा सुन्दर सपना बीत गया" , देखिये कितनी मजेदार बाते लिखी हैं इस गाने में: दुर्रानी : मैं बाज़ आया मोहब्बत से, उठा लो पान दान अपना गीता दत्त : तुम्हारी मेरी उल्फत का हैं दुश्मन खानदान अपना दुर्रानी : तो ऐसे खानदान की नाक में अमचूर करो जी सचिन देव बर्मन ने जिस साल गीता रॉय को फिल्म दो भाई के दर्द भरे गीतों से लोकप्रियता की चोटी पर पहुंचाया उसी साल उन्ही की संगीत बद्ध की हुई फिल्म आई थी "दिल की रानी". जवान राज कपूर और मधुबाला ने इस फिल्म में अभिनय किया था. उसी फिल्म का यह मीठा सा प्रेमगीत हैं "आहा मोरे मोहन ने मुझको बुलाया हो". इसी फिल्म में और एक प्यार भरा गीत था "आयेंगे आयेंगे आयेंगे रे मेरे मन के बसैय्या आयेंगे रे". और अब आज की आखरी पेशकश है संगीतकार बुलो सी रानी का फिल्म दरोगाजी (१९४९) के लिया संगीतबद्ध किया हुआ प्रेमगीत "अपने साजन के मन में समाई रे". बुलो सी रानी ने इस फिल्म के पूरे के पूरे यानी 12 गाने सिर्फ गीता रॉय से ही गवाए हैं. अभिनेत्री नर्गिस पर फिल्माया गया यह मधुर गीत के बोल हैं मनोहर लाल खन्ना (संगीतकार उषा खन्ना के पिताजी) के. गीता की आवाज़ में लचक और नशा का एक अजीब मिश्रण है जो इस गीत को और भी मीठा कर देता हैं. वर्ष 1957 मे गीता दत्त और गुरूदत्त की विवाहित जिंदगी मे दरार आ गई। गुरूदत्त ने गीता दत्त के काम में दखल देना शुरू कर दिया। वह चाहते थे गीता दत्त केवल उनकी बनाई फिल्म के लिए ही गीत गाये। काम में प्रति समर्पित गीता दत्त तो पहले इस बात के लिये राजी नही हुयी लेकिन बाद में गीता दत्त ने किस्मत से समझौता करना ही बेहतर समझा। धीरे-धीरे अन्य निर्माता निर्देशको ने गीता दत्त से किनारा करना शुरू कर दिया। कुछ दिनो के बाद गीता दत्त अपने पति गुरूदत्त के बढ़ते दखल को बर्दाशत न कर सकी और उसने गुरूदत्त से अलग रहने का निर्णय कर लिया। इस बात की एक मुख्य वजह यह भी रही कि उस समय गुरूदत्त का नाम अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ भी जोड़ा जा रहा था जिसे गीता दत्त सहन नही कर सकी। गीता दत्त से जुदाई के बाद गुरूदत्त टूट से गये और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे मे डूबो दिया। दस अक्तूबर 1964 को अत्यधिक मात्रा मे नींद की गोलियां लेने के कारण गुरूदत्त इस दुनियां को छोड़कर चले गए। गुरूदत्त की मौत के बाद गीता दत्त को गहरा सदमा पहुंचा और उसने भी अपने आप को नशे में डुबो दिया। गुरूदत्त की मौत के बाद उनकी निर्माण कंपनी उनके भाइयो के पास चली गयी। गीता दत्त को न तो बाहर के निर्माता की फिल्मों मे काम मिल रहा था और न ही गुरूदत्त की फिल्म कंपनी में। इसके बाद गीता दत्त की माली हालत धीरे धीरे खराब होने लगी। कुछ वर्ष के पश्चात गीता दत्त को अपने परिवार और बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ तरुण ( 1954), अरुण (1956),और नीना ( 1962) का भविष्य उनके सामने था और वह पुन: फिल्म इंडस्ट्री में अपनी खोयी हुयी जगह बनाने के लिये संघर्ष करने लगी। "मंगेशकर बैरियर" भी सामने था लिहाज़ा वो दुर्गापूजा में होने वाले स्टेज कार्यकर्मों के लिए गा कर गुज़र बसर करने लगी,ज़मींदार घराने की गीता दत्त के आख़िरी दिन मुफलिसी में गुज़रे ,1967 में रिलीज़ बंग्ला फिल्म बधू बरन में गीता दत्त को काम करने का मौका मिला जिसकी कामयाबी के बाद गीता दत्त कुछ हद तक अपनी खोयी हुयी पहचान बनाने में सफल हो गई। हिन्दी के अलावा गीता दत्त ने कई बांग्ला फिल्मों के लिए भी गाने गाए। इनमें तुमी जो आमार (हरनो सुर-1957), निशि रात बाका चांद (पृथ्वी आमार छाया-1957), दूरे तुमी आज (इंद्राणी-1958), एई सुंदर स्वर्णलिपि संध्या (हॉस्पिटल-1960), आमी सुनचि तुमारी गान (स्वरलिपि-1961) जैसे गीत श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है। सत्तर के दशक में गीता दत्त की तबीयत खराब रहने लगी और उन्होंने एक बार फिर से गीत गाना कम कर दिया। 1971 में रिलीज़ हुई अनुभव में गीता दत्त ने तीन गीत गाये थे,संगीतकार थे कनु राय " कोई चुपके से आके" "मेरा दिल जो मेरा होता ""मेरी जान मुझे जान न कहो" इस फिल्म में काम करने के बाद वो बीमार रहने लगी:आखिकार 20 जुलाई 1972 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया ।

Tuesday, July 10, 2012

एक थी "विम्मी"


विमलेश सिल्वर स्क्रीन की चकाचौंध भरी जिंदगी का स्याह पेज है,इनकी शुरूआती जिंदगी के बारे में जानकारी बहुत ही कम है,बीते जमाने के कई मशहूर कलाकारों का आखिरी वक़्त मुफलिसी में गुज़रा (कई नाम हैं जिन पर फिर कभी बात होगी)  विमलेश अग्रवाल का जन्म 1935 में पंजाब के जालंधर में हुआ था,विमलेश जिद्दी पंजाबी लड़की थी जो सबसे पहले अपने माता-पिता के खिलाफ विद्रोह करती है और एक मारवाड़ी उद्योगपति के बेटे शिव अग्रवाल से शादी कर लेती है,जालंधर से उनका परिवार बम्बई पहुंचा और बस गया  विमलेश ने बम्बई सेंट सोफिया कालेज से मनोविज्ञान में "एम्.ऐ.किया बम्बई में उनकी मुलाक़ात हुई  शिव अग्रवाल से जल्दी दोनों ने शादी  करने का फैसला कर लिया इस शादी के लिए दोनों के परिवार तैयार नहीं थे विमलेश साधारण परिवार से थी और शिव करोड़पति परिवार से जिनका कलकत्ता में  स्टील का कारोबार था ,बरहाल विमलेश ने अपनी जिद पूरी की शिव से शादी कर ली और कलकत्ता में जा बसी,जिद्दी विमलेश का दूसरा विद्रोह था ससुराल वालों से, बी आर चोपड़ा. एक सस्पेंस फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे,नायिका की तलाश कर रहे थे उन्हें जरूरत थी एक नए  चेहरे की,सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थी,"हमराज" यही नाम था आने वाली फिल्म का जो हिंदी सिनेमा के इतिहास की एक और कामयाब फिल्म होने का तमगा पाने जा रही थी हमराज के  संगीत निर्देशक रवि ने विम्मी को कलकत्ता में एक पार्टी में देखा और उन्हें बम्बई आने की दावत दे दी विमलेश पर अब जिद  सवार थी "हेरोइन" बनने की  जिसके लिए ससुराल वालों से लड़ी,पति शिव अग्रवाल  ने "विमलेश" का साथ दिया, अपने दोनों बच्चों को ससुराल में छोड़  कर पति पत्नी बम्बई आ गये,और यहाँ दो बच्चों की माँ विमलेश  बन गयी बी आर चोपड़ा. की 'हमराज़' 1967 की नायिका "विम्मी"बला की खूबसूरत "विम्मी" के दीवाने साहिर लुधियानवी भी हो गये थे ऐसा कहा जाता है हमराज का यह गीत "विम्मी" को ही देख कर साहिर लुधियानवी ने लिखा था "किसी पत्थर की मूरत से,मोहब्बत का  इरादा है,प्राश्चित की तमन्ना है,इबादत का इरादा है"हमराज" के बीस सीन में "विम्मी"थी हर सीन में नयी ड्रेस थी इस फिल्म के लिए उन्हें मिले थे तीन लाख रूपये "हमराज" के हिट होते ही "विम्मी" के पास फिल्म निर्माता उन्हें हाथों हाथ लेने की दौड़ पड़े,एक सुपर हिट "विम्मी" के खाते में थी, पर विम्मी ने कई  मशहूर निर्मातों के आफर यह कह ठुकरा दिए की यह सब वक्ती है "हमराज" के बाद उनके हाथ में सिर्फ "आबरू" (1968) थी,पति शिव अग्रवाल "विम्मी" के साथ शूट पर जाते थे शिव अग्रवाल उस वक्त अड़ जाते थे जब रोमांटिक सीन्स होते थे रोमांटिक सीन्स पर इस एतराज़ पर "विम्मी" ने पति को शुरू में समझाने की कोशिश  की पर शिव नहीं माने,पति का "हस्तक्षेप बढ चुका था"विम्मी"को यकीन"जॉली" पर था,लिहाज़ा  पति पत्नी के बीच दूरियां आने लगी वे  लोग सेट पर लड़ाई करते देखे जाने लगे और इस आग में घी डालने का काम "जॉली ' ने किया "जॉली ' नाकामयाब निर्माता  थे, अपनी पत्नी को पराये मर्द की बात मानता देख शिव अग्रवाल "विम्मी" को छोड़ कर कलकत्ता वापस अपने परिवार के पास लौट गये,हमराज़  (1967) के अलावा विम्मी ने आबरू (1968) नानक नाम जहाज़  है  (1969) पंजाबी,पतंगा (1971) गुड्डी(1971) कही आर कहीं  पार(1971)वचन(1974) में काम किया था,पर किसी फिल्म को हमराज जैसी कामयाबी नहीं मिली, नानक नाम जहाज़  है (1969) पंजाबी फिल्म ने सिल्वर जुबली की थी लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, विम्मी साधारण परिवार से थी,ससुराल करोड़ पति था लिहाज़ा वो महंगी जीवन शैली जीने की आदि थी,अब ना तो वो स्टारडम था और न पैसा ले देकर एक ही आदमी था उनके जीवन में जिसका नाम था "जॉली" ने विम्मी का भरपूर" इस्तेमाल" किया और उसी ने एक दिन गम गलत करने के लिए विम्मी के हाथ में देशी दारू की बोत्तल दे दी अब विम्मी नशे की आदि हो चुकी थी अगर इस सच पर यकीन करें तो विम्मी ने पेट की भूख शांत करने और शराब के लिए "वेश्यावृत्ति" शुरू कर दी महज 42 साल की उम्र में विम्मी की मौत बम्बई के एक सरकारी अस्पताल नानावती के जनरल वार्ड में 22 अगस्त 1977 में हुई और सांताक्रूज शवदाह गृह में उनका अंतिम संस्कार हुआ जहाँ उनका शव हतथू "ठेले" पर लेकर पहुंचा था जॉली,जहाँ कुल नौ लोग थे,फ़िल्मी दुनिया से निर्माता /निर्देशक एस.दी.नारंग और उनके भाई मौजूद थे,जॉली कब विम्मी के नजदीक आया पता नहीं कहा जाता है के उसने निर्मातों से रूपये लेने शुरू कर दिए थे की वो विम्मी का "खास" शूट करवा देगा जब इस शूट की बारी आती तो शिव अग्रवाल बीच में आ जाते तब विम्मी जॉली का पक्ष लेती सेट पर ही जल्द ही यह वज़ह विम्मी और शिव के बीच अलगाव बनी अब थी "विम्मी" और शराब न घर न ससुराल न दोस्त,ना फ़िल्मी दुनिया से कोई.और नाही बच्चे जिन्हें वो कलकत्ता में छोड़ आई थी,मायका वो शिव के लिए छोड़ आई थी ससुराल फिल्मों के लिए,शिव ने "विम्मी'की  हेरोइन बनने की जिद को पूरा करने के लिए कलकत्ता  छोड़ा, रोमांटिक सीन्स ने पति पत्नी को अलग किया जॉली की चालों और "विम्मी" की जिद ने,बम्बई सड़कों पर इम्पाला कार का इस्तेमाल करने वाली "विम्मी" का अंतिम सफर  हतथू "ठेले" पर  था जो आया था बम्बई नगर निगम से,बहुत ज्यादा देशी शराब पीने से उनका लीवर खराब हो चुका था  
 जब वो अपने पति के साथ बम्बई आई थी तब उनका ठिकाना था होटल ताज महल का वी.आई.पी. सूट.उनका इरादा था शायद हमराज़ करके वापस कलकत्ता लौट जाना,होनी को कुछ और ही मंज़ूर था,जिद्दी विम्मी को पति का एतराज़  रोमांटिक सीन्स को लेकर पसंद नहीं आया  निर्मातों ने विम्मी को अपनी फिल्म से निकाल दिया कुछ ने रूपये वापस ले लिए,लिहाजा जॉली की सलाह पर कुछ फ़िल्में साइन तो की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी  ज़िन्दगी के आखिरी दिन किसी चौल  में भी गुज़ारे थे "विम्मी" ने, हैरानी की बात तो यह है उनका भरोसा आखिर तक जॉली पर बना रहा,जॉली ही उन्हें अर्श से फर्श पर लाया था उसी ने एक बेहद जिद्दी औरत को कही का नहीं छोड़ा था यह जिद थी एक औरत की या जॉली के रूप में थी "विम्मी" की बर्बादी 

टिकैत राय


अवध की गंगा जमुनी तहज़ीब की मिसाल शायद कही मिले,अवध के नवाबों और उनकी बेगमों ने मंदिर तामीर करवाए तो हिन्दू राजाओं ने रौज़े,इमामबाड़े,और मस्जिदों की तामीर करवाई,इतिहास के इन्ही पन्नों में दर्ज है "महाराजा टिकैत राय"का नाम जिनके जिर्क के बिना अवध की गंगा जमुनी तहज़ीब की मिसाल अधूरी रहेगी, "महाराजा टिकैत राय " ने पुराने लखनऊ में एक मस्जिद की तामीर करवाई जिसे टिकैत राय की मस्जिद के नाम से जाना जाता है,और इस इलाके को टिकैतगंज के नाम से जाना जाता है मस्जिद और यह मोहल्ला आज भी कायम है, "महाराजा टिकैत राय " ने लखनऊ हरदोई मार्ग पर रहमान खेडा के नजदीक बेहटा नदी के किनारे भगवान् शिव के मंदिर की स्थापना की यह साल था 1795. बेहटा नदी पर बने पुराने पुल जब जर्ज़र हो गया तो पास में एक और पुल बना दिया गया,पुराने पुल पर दो भव्य प्रवेश द्वार आज भी कायम है,यह मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के द्वारा संरक्षित घोषित किया जा चुका है,इसी दौरान पुराने लखनऊ के में शीतला माता के नाम पर मेहँदी गंज में मंदिर का निर्माण करवाया जहाँ आज भी होली के आठवें दिन मेला लगता है, महाराजा टिकैत राय बहादुर (1760–1808 ) कायस्थ परिवार से थे,1791- 1796 के बीच महाराजा टिकैत राय बहादुर अवध में दीवान थे Asaf-u-daula.के शासन काल में "महाराजा टिकैत राय ने लखनऊ में तब के भदेवा के जंगल में तालाब की तामीर करवाई,यह इलाका अब राजाजी पुरम के नाम से जाना जाता है,अब यह तालाब सिर्फ नाम भर का ही रह गया है,तालाब की ज़मीन पर कालोनी खड़ी हो गयी,इसी तालाब के करीब सरकारी कर्मचारियों की आवासीय कालोनी बनी जिसे टिकेत राय तालाब कालोनी के नाम से जाना जाता है, इस तालाब को ख़ूबसूरती देने के लिए लखनऊ के तब के सांसद अटल बिहारी बाजपेइ ने यहाँ MUSICAL FOUNTEIN बनवा दिया मंशा थी की यह तालाब अच्छा लगेगा..पर अटल जी की इस कोशिश को भी भुला दिया गया.

दारा सिंह

दारा सिंह के लिए दुआ किजीये मुम्बई के एक अस्पताल में भर्ती "रुस्तमे हिंद" की हालत बेहद नाज़ुक है दारा सिंह जन्म: 19 नवम्बर, 1928, पंजाब) अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान रहे हैं। उन्होंने 1959 में विश्व चैम्पियन जार्ज गारडियान्को को कामनवेल्थ की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी। साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। बाद में उन्होंने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज के साथ हिन्दीकी स्टंट फ़िल्मों में प्रवेश किया और कई फिल्मों के अभिनेता निर्देशक एवं निर्माता भी रहे। उन्हें टी० वी० धारावाहिक रामायण में हनुमानजी के अभिनय से अपार लोकप्रियता मिली जिसके परिणामस्वरूप भारतीय जनता पार्टी ने राज्य सभा की सदस्यता भी प्रदान की।दारा सिंह सिंह रंधावा का जन्म 19 नवम्बर 1928 को अमृतसर (पंजाब) के गाँव धरमूचक में श्रीमती बलवन्त कौर और श्री सूरत सिंह रंधावा के यहाँ हुआ था। कम आयु में ही घर वालों ने उनकी मर्जी के बिना उनसे आयु में बहुत बड़ी लड़की से शादी कर दी। माँ ने इस उद्देश्य से कि पट्ठा जल्दी जवान हो जाये उसे 100 बादाम की गिरियों खांड और मक्खन में कूट कर खिलाना और ऊपर से भैंस का दूध पिलाना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सत्रह साल की नाबालिग उम्र में ही दारा सिंह प्रदुम्न नामक बेटे के बाप बन गये। दारा सिंह का एक छोटा भाई सरदारा सिंह भी था जिसे लोग रंधावा के नाम से ही जानते थे। दारा सिंह और रंधावा - दोनों ने मिलकर पहलवानी करनी शुरू कर दी और धीरे-धीरे गाँव के दंगलों से लेकर शहरों में कुश्तियाँ जीतकर अपने गाँव का नाम रोशन करना प्रारम्भ किया। 1947 में दारा सिंह सिंगापुर आ गये। वहाँ रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैम्पियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। उसके बाद उनका विजय रथ अन्य देशों की चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे 1952 में भारत लौट आये। भारत आकर सन 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैम्पियन बने। उसके बाद उन्होंने कामनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैम्पियन किंगकांग को परास्त कर दिया। बाद में उन्हें कनाडा और न्यूजीलैण्ड के पहलवानों से खुली चुनौती मिली। अन्ततः उन्होंने.कलकत्ता में हुई कामनवेल्थ कुश्ती चैम्पियनशिप में कनाडा के चैम्पियन जार्ज गार्डीयांका एवं न्यूजीलैण्ड के जान डिसिल्वा को धूल चटाकर यह चैम्पियनशिप भी अपने नाम कर ली। यह 1959.की घटना है। दारा सिंह ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहाँ फ्रीस्टाइल कुश्तियाँ लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये। 1983 में उन्होंने अपराजित पहलवान के रूप में कुश्ती से सन्यास ले लिया। जिन दिनों दारा सिंह पहलवानी के क्षेत्र में अपार लोकप्रियता प्राप्त कर चुके उन्हीं दिनों उन्होंने अपनी पसन्द से दूसरा और असली विवाह एक एम० ए० पास लड़की जिसका नाम सुरजीत कौर है, से किया। आज दारा सिंह के भरे-पूरे परिवार में तीन बेटियाँ और दो बेटे हैं । 1952 में उन्होंने फिल्मों में प्रवेश किया आपकी आखिरी फिल्म थी 2007 में रिलीज़ जब वी मैट,दारा सिंह की 16 फिल्मों की नायिका थी मुमताज़ प्रमुख फिल्में वर्ष फ़िल्म 2007 जब वी मैट 2002 शरारत 2001 फ़र्ज़ 2000 दुल्हन हम ले जायेंगे 1999 ज़ुल्मी 1999 दिल्लगी 1997 लव कुश 1995 राम शस्त्र 1994 करन 1992 प्रेम दीवाने 1991 धर्म संकट 1991 अज़ूबा 1989 घराना 1988 पाँच फौलादी 1988 महावीरा 1986 कृष्णा-कृष्णा 1986 कर्मा 1985 मर्द 1981 खेल मुकद्दर का 1978 भक्ति में शक्ति 1978 नालायक 1976 जय बजरंग बली 1975 वारंट 1975 धरम करम 1974 दुख भंजन तेरा नाम 1974 कुँवारा बाप 1973 मेरा दोस्त मेरा धर्म 1970 मेरा नाम जोकर 1970 आनन्द 1965 सिकन्दर-ए-आज़म 1965 लुटेरा 1962 किंग कौंग 1955 पहली झलक 1952 संगदिल बतौर निर्देशक 1978 भक्ति में शक्ति 1973 मेरा दोस्त मेरा धर्म

Friday, April 20, 2012

लखनऊ की सरज़मी"

२१ अप्रैल १९१३ को भारत की पहली फिल्म "राजा हरीशचन्द्र " का प्रदर्शन हुआ था और जल्दी लखनऊ और हिंदी सिनेमा का नाता जुड़ गया जो आज भी कायम है लखनऊ 60-70 के दशक में BOLLYWOOD की खास पसंद रहा था,नवाब,कोठे,और तवायफ की जिंदगी-तहजीब और नफासत बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की भीड़ बटोरती रही,यह सिलसिला मधुबाला की "एक साल" से शुरू हुआ था जो लखनऊ की रजनी की सच्ची कहानी पर आधारित थी, गुरुदत्त की चौदहवीं का चाँद (1960),ने लखनऊ को नयी पहचान दे दी,तब संगीतकार रवि की धुन पर शकील बदायुनी ने लखनऊ के नाम पर एक अमर गीत लिख दिया "ये लखनऊ की सरज़मी" इस गाने में जो कसर रह गयी थी उसे फिल्म पालकी (1966) में पूरा कर दिया, महेश कॉल की "पालकी" (1966)जिसमें राजेन्द्र कुमार वहीदा रहमान की मुख्य भूमिका थी संगीतकार थे लखनऊ के नौशाद अली, एक बार शकील बदायुनी ने लखनऊ को समर्पित गीत की रचना कर दी,"शहरे लखनऊ तुझ को मेरा सलाम है"हरनाम सिंह रवैल (जो राहुल रवैल के पिता थे) ने मेरे महबूब (1963) बनाई तो वो भी सुपर हिट रही,मेरे हुजुर (1966) गीत रामानंद सागर (1970),महबूब की मेंहदी (1971) कमाल अमरोही की पाकीजा (1972),शक्ती सामंत अनुरोध (1975) शशिकपूर की जुनून(1978),सत्यजीत राय की शतरंज के खिलाडी(1978) राजश्री की सावन को आने दो (1980) मुज्ज़फर अली की उमराव जान (1981),गमन,अंजुमन,दीदारेयार(1982)बहु -बेगम, दहेज़,शीश महल मेंहदी,शमा, ग़दर एक प्रेम कथा जे.पी.दत्ता की उमराव जान(2006), बाबर,ओमकारा,मैं मेरी पत्नी और वो,अनवर,कबीर कौशिक की फिल्म "शहर" एक IPS की पर आधारित थी.बीते दिनों "तनु वेड्स मनु" की शूटिंग यहाँ हुई, इन सभी फिल्मों में लखनऊ के दीदार होते रहे.बटवारे के वक़्त सुनील दत्त ने लखनऊ की गन्ने वाली गली के मकान न.102 में काफी साल बिताये,संजय दत्त जब लखनऊ से लोकसभा उम्मीदवार के रूप में सामने आये तो लखनऊ और BOLLYWOOD का नाता एक बार फिर सामने आया,1996 राज बब्बर,2004 में मुज्ज़फर अली और 2009 में नफीसा अली ने यहाँ से लोकसभा चुनाव लड़ा.बेगम अख्तर का जिक्र किये बिना यह सफ़र अधुरा रहे जाऐगा,यह बात और ही की ग़ज़ल और ठुमरी की मल्लिका ने चंद फिल्मों में ही गाया,पर बेगम अख्तर और लखनऊ का नाम एक पहलु के दो सिक्के हैं, (बेगम अख्तर की कब्र पुराने लखनऊ के वजीरबाग के पसंद बाग में है) लखनऊ मैं कभी कई निर्मातों के दफ्तर व studioहुआ करते थे कुछ के निशान अभी भी बाकि हैं लखनऊ मैं,गुज़रे वक्त मैं तारीखी लम्हों के साथी बने कई सिनेमा हाल बंद हो चुकें और कुछ बंद होने की तयारी मैं इसी शहर के अमीनाबाद बाज़ार में लैला भी कभी मिली थी (गाना फिल्म मेरे हुजुर से) "एक दिन लैला मिली मुझको अमीनाबाद में" अब लखनऊ में शूट होने हिन्दी फिल्मों से वो सब कुछ गायब हो गया है जिसके लिए लखनऊ जाना जाता था"लखनऊ से जुड़े फिल्मकार गीतकार-- 1.मजरूह सुल्तानपुरी,2. कैफी आज़मी,3.जानिसार अख्तर के बाद उनके बेटे 4. जावेद अख्तर संवाद लेखक \कहानीकार 1.भगवती चरण वर्मा,2. अमृत लाल नागर, 3.डा.कुमुद नागर,4.डा.अचला नागर, 5.वजाहत मिर्जा,6.के.पी.सक्सेना,संगीतकार 1.प.विश्न्नु नारायण भातखंडे,(भातखंडे के नाम पर अब univercity भी है)2.नौशाद अली,निर्माता\निर्देशक 1.अलीरजा,2.अली सरदार जाफरी, 3.इस्माइल मर्चंट,(शेक्स्पिर्वाला) गायक,गायिका 1.तलत महमूद,2.अनूप जलोटा,3.बाबा सैहगल 1.बेगम अख्तर 2.पूनम जाटव, अभिनेता\अभिनेत्री 1.वीणा राय, जो बाद में प्रेम नाथ की पत्नी बनी,2. जया भट्टाचार्या,आप लोगों को फिल्म शोले का खास किरदार साम्भा तो याद ही ना ? मेक मोहन इनका ताल्लुक भी लखनऊ से है कथक के छेत्र में 1.लच्छु महाराज,2.शम्भू महाराज,3.बिरजू महाराज,3.अच्छन महाराज